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बैंकों के लिए खतरे की घंटी 

पाकिस्तान के किसी वित्तीय संस्थान पर हुए अब तक के पहले साइबर हमले ने संपूर्ण वित्तीय क्षेत्र के साथ ही सभी पक्षों के लिए खतरे की एक ऐसी घंटी बजाई है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, लेकिन लगता है हमारे सिस्टम ने गलतियों से सबक लेना छोड़ दिया है। इस साइबर हमले में बैंक को 2.6 अरब रुपये का चूना लगा, लेकिन यह राशि कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती थी। सबसे बड़ी बात, यह उस वक्त हुआ, जब पाकिस्तान की वित्तीय प्रणाली में बड़ी चूक सामने आ चुकी थी। राष्ट्रीय बचत निदेशालय के डाटाबेस में तकनीक संबंधी खतरनाक चूक के खुलासे के बाद भी अगर सिस्टम सक्रिय हुआ होता, तो शायद यह घटना न होती। दोनों मामलों में चूक की प्रकृति भले ही अलग हो, यह तो सामने आता ही है कि देश की वित्तीय प्रणाली अपनी ही कमजोरियों के कारण खतरे में है और तत्काल प्रभावी कदम न उठे, तो बड़ा नुकसान हो सकता है।

बैंक पर साइबर हमले की छानबीन बताती है कि संपूर्ण वित्तीय ढांचा दोषपूर्ण है। उदाहरण के लिए ऐसे किसी हादसे के बाद कोई भी उम्मीद करेगा कि भुक्तभोगी समान प्रकृति वाले ऐसे संस्थानों को सतर्क करेगा, ताकि वे भविष्य में ऐसे किसी संकट के प्रति सतर्क रहें और एहतियाती कदम उठा सकें। यह भी होगी कि ऐसे खतरों के बाद कम से कम स्टेट बैंक और भुगतान करने वाले बैंक को तो जरूर बताया जाएगा, लेकिन यह भी समय रहते नहीं हुआ। सच तो यह है कि सतर्कता जारी करने का हम आज तक कोई तंत्र ही विकसित नहीं कर पाए और यह भी कि हमारे ज्यादातर संस्थान खामी दबाने में ही ज्यादा रुचि लेते हैं। उन्हें लगता है कि खामियां उजागर होने से ग्राहक प्रभावित होंगे, लेकिन उन्हें यह चिंता नहीं सताती कि साइबर हमलों में बैंक लुट जाने का असुरक्षा बोध तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है और स्थाई असर करने वाला है। उन्हें अपनी खामियों पर लीपापोती न करके इनके समाधान का स्थाई तरीका निकालना चाहिए, क्योंकि इसमें कोई शक नहीं कि हैकर्स तो तैयार बैठे हैं और अगला साइबर हमला कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है। 

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  • Web Title:videshi media column of hindustan on 7th november