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ग्लेशियरों का पिघलना

 

 

नेपाल का हिंदुकुश हिमालयी क्षेत्र दुनिया के कई ऊंचे पर्वत शिखरों का घर है और यह सदियों से हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक रहा है। मगर जलवायु परिवर्तन के लिहाज से इस क्षेत्र की संवेदनशीलता भी लंबे वक्त से उपेक्षित रही है। अब ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ ने अपने सघन अध्ययन के बाद यह चेतावनी दी है कि अगर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में दुनिया के प्रयास नाकाम हुए और कार्बन उत्सर्जन की मौजूदा गति बनी रही, तो 2100 तक इस क्षेत्र के दो-तिहाई ग्लेशियर पिघल जाएंगे। इस पहले विशद अध्ययन ने क्षेत्र की खौफनाक संवेदनशीलता की जो तस्वीर उकेरी है, वह एक हकीकत है। यदि इस सदी के अंत तक ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का पेरिस समझौते का लक्ष्य हासिल कर भी लिया गया, तब भी हिंदुकुश हिमालयी क्षेत्र के लगभग आधे ग्लेशियर तापमान में दो डिग्री तक आए बदलाव की वजह से पिघल जाएंगे। 350 शोधार्थियों और नीतिगत-विशेषज्ञों के पांच वर्षों के गहन अध्ययन और साझीदारी से तैयार इस रिपोर्ट के निष्कर्ष साफ बताते हैं कि सरकार को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में बहुपक्षीय, बहुराष्ट्रीय पहल करने की जरूरत है। ग्लेशियरों के यूं पिघलने का अनर्थकारी असर गंगा और मेकांग समेत अनेक नदियों पर तो पडे़गा ही, इसका बुरा प्रभाव खाद्यान्न आपूर्ति, ऊर्जा के साथ-साथ दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के करोड़ों लोगों की जिंदगी पर भी होगा। हालांकि, नेपाल सरकार ने अपने सकारात्मक प्रयासों के लिए विश्व बिरादरी से वित्तीय मदद की कई अपीलें कीं, पर हिंदुकुश हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के पर्यावरणीय प्रशासन के लिए एक तंत्र विकसित करने की दिशा में कुछ नहीं हुआ। यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक तथ्य के प्रति सरकारों की उदासीनता को उजागर करती है। इसके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से सबसे पहले गरीब प्रभावित होंगे। इस क्षेत्र के करीब 25 करोड़ पहाड़ वासियों में से एक तिहाई लोग 1.9 डॉलर में रोजाना गुजर-बसर करते हैं, वे इसके सबसे पहले शिकार बनेंगे।
 
 

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  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 7 february