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संघवाद का विकास

नेपाल में संघवाद नया है और जब हमारा देश अपनी व्यवस्था को संस्थागत रूप से मजबूत बनाने की जद्दोजहद में जुटा है, तो हमें सचमुच गंभीर विमर्शों की दरकार है। अगर देश बिल्कुल शुरुआत में ही गड़बड़ियों का शिकार हुआ, तो फिर आगे बेहद मुश्किल राह के लिए इसे तैयार रहना चाहिए। प्रोविंस-2 की सरकार जिस तरह से अपने ‘प्रोविंशियल पुलिस बिल’ के साथ आगे बढ़ी, उसे एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। प्रोविंस-2 के इस कदम ने एक बहस को जन्म दिया है, जिसे तार्किक अंजाम देना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी कोई सूरत पैदा हो, तो उससे निपटा जा सके। नेपाल ने केंद्रीकृत व्यवस्था के खिलाफ वर्षों के संघर्ष के बाद संघवाद का सफर तय किया है। साल 2007 के अंतरिम संविधान ने देशवासियों से संघीय व्यवस्था का वादा किया था, और 2015 में संविधान सभा ने नेपाल का नया संविधान तैयार कर देश में एक नए युग का आरंभ किया। इस संविधान के प्रावधानों के तहत पिछले साल तीन स्तरीय- केंद्रीय, प्रांतीय और स्थानीय चुनाव कराए गए। लेकिन यह तो सिर्फ इसका तकनीकी पहलू है। प्रांतीय सरकारों के सुचारू रूप से काम करने के लिए केंद्र सरकार और संसद को वे तमाम कानून पारित करने चाहिए थे, जिनके तहत सूबाई सरकारें अपने कायदे-कानून बना सकें। लेकिन अपने गठन के 10 महीने बाद भी संसद उन संघीय कानूनों को बनाने में नाकाम रही है, जो निचले स्तर की सरकारों के सुचारू संचालन के लिए अनिवार्य हैं। 
प्रोविंस-2 की सरकार का यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है कि उसका बिल ‘सांविधानिक प्रावधानों के अनुरूप है’, लेकिन इसके विरोध में यह तर्क भी दिया जा सकता है कि आखिर उसे क्या हड़बड़ी थी, वह केंद्रीय कानून के बनने तक तो इंतजार कर ही सकती थी? दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारों को गाड़ी के दो पहिए की तरह काम करना चाहिए, ताकि नेपाल के लोग सही मायने में संघवाद का फल चख सकें।
 

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  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 6 november