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कतरे हुए पंख से उड़ान

वैश्विक अर्थव्यवस्था में पर्यटन सबसे लचीला क्षेत्र माना जाता है और इसमें लगातार वृद्धि भी हो रही है। संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन की नजर में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटक संख्या नए रिकॉर्ड पर पहुंच चुकी है और एशिया, खासतौर से दक्षिण एशियाई देश इस मामले में अव्वल हैं। चीन और भारत तो पर्यटन की दृष्टि से सबसे ज्यादा यात्राएं कराने वाले देश के रूप में दर्ज हुए हैं। दक्षिण एशिया में अगले दस वर्षों में जबर्दस्त उछाल की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। लेकिन इस सबके बावजूद नेपाल अब भी बहुत पिछड़ा है।

ऐसा नहीं है कि यहां पर्यटक नहीं बढ़े या पर्यटन उद्योग फिसड्डी है। असल समस्या यह भी नहीं कि यह अन्य एशियाई देशों के साथ कदमताल नहीं कर पा रहा, बल्कि असल समस्या यहां बुनियादी पर्यटन ढांचे की कमी है, जो इसे प्रतिस्पद्र्धा में पीछे धकेल रहा है। देश के अकेले त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने भी पर्यटकों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा देखा है, लेकिन वह अपनी हालत पर आंसू बहा रहा है। एयरपोर्ट अथॉरिटी स्वयं अपनी ढांचागत स्थिति से संतुष्ट नहीं है। यहां सबसे बड़ी समस्या विमानों के लिए समुचित पार्किंग और यात्रियों के सामान के लिए कन्वेयर बेल्ट की कमी है।

हालत इतनी खराब है कि कई बार यात्रियों को अपना सामान लेने के लिए दो से ढाई घंटे तक इंतजार करना पड़ जाता है। जगह न होने के कारण विमान लैंडिंग में विलंब तो आम बात है। स्वाभाविक है कि इन कारणों से नेपाल की छवि खराब होती है और कहीं न कहीं यह पर्यटन स्थितियों को भी प्रभावित कर रहा है। यह सब उस देश के साथ हो रहा है, जो न्यूयॉर्क टाइम्स  और लोनली प्लैनेट के ट्रैवेल गाइड में एक अनिवार्य पर्यटन यात्रा स्थल के रूप में दर्ज है। तमाम पिछली गलतियां भुला भी दी जाएं, तो यह स्पष्ट है कि नेपाल वर्तमान में हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे के जबर्दस्त संकट से गुजर रहा है। उम्मीद है कि वैश्विक पर्यटन हालात से उत्साहित होकर सरकार इस दिशा में कुछ कारगर कदम उठाएगी और तब शायद देश के पर्यटन विकास की नई इबारत लिखी जाएगी।
 

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