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एक और उपलब्धि

वैश्विक स्वास्थ्य सुधार में टीकाकरण की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है, इसे बच्चों में न्यूमोनिया, दस्त, खसरा और पोलियो जैसी घातक बीमारियों में आए नियंत्रण से समझा जा सकता है। स्वाभाविक रूप से नेपाल भी इसमें पीछे नहीं है। वृहद स्तर पर टीकाकरण के कारण ही यहां शिशु और मातृ मृत्यु दर में तो अप्रत्याशित कमी आई ही, अस्पताल पहुंचने के मामले भी घटे। यह सच है कि 2014 में नेपाल पोलियो मुक्त घोषित हो चुका है, लेकिन खसरा और रूबेला जैसी स्थानीय लेकिन खतरनाक बीमारियां अब भी कहीं न कहीं बचपन के लिए घातक बनी हुई हैं। रूबेला जैसी गंभीर संक्रामक बीमारी जन्म के साथ ही नवजात को गिरफ्त में ले लेती है और अल्प आयु में ही मोतियाबिंद, हृदय रोग, हड्डी और मस्तिष्क से जुड़ी तमाम बीमारियों का कारण बनती है। यह अलग बात है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित समय सीमा से पहले ही इसे रूबेला पर नियंत्रण का प्रमाणपत्र जरूर मिल चुका है और कई अन्य रिपोर्ट भी नेपाल में रूबेला पर नियंत्रण की पुष्टि करती हैं। नेपाल के लिए यह गर्व का क्षण है कि इसका टीकाकरण अभियान खतरनाक बीमारियों पर नियंत्रण की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है। उल्लेखनीय है कि 2014 में डब्ल्यूएचओ-दक्षिण-पूर्व एशिया ने एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत 2020 तक रूबेला पर नियंत्रण और खसरा के खात्मे की घोषणा की थी। नेपाल ने 2012 और भयावह भूकंप की त्रासदी के बाद 2015-16 में खसरा और रूबेला पर सघन अभियान चलाए, जिसका खासा असर हुआ। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 2008 में नेपाल में रूबेला के 786 मामले मिले थे, लेकिन भला हो टीकाकरण अभियान का कि 2017 तक आते-आते यह संख्या 22 पर आ गई, यानी 97 प्रतिशत नियंत्रण हो चुका था। बीते दो दशकों में सीमित साधनों के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में खासा काम हुआ।  उम्मीद है कि स्वास्थ्य क्षेत्र की बेहतरी की मौजूदा रफ्तार बनी रहेगी और वह दिन दूर नहीं, जब नेपाल को एक पूर्ण स्वस्थ राष्ट्र बनाने का सपना सच होगा।

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  • Web Title:videshi media column of hindustan on 1st of september