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कम महिला मतदाता 

हाल ही में पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने जुलाई 2018 के चुनाव में पंजीकृत महिला और पुरुष मतदाताओं की जिलेवार संख्या जारी की है, जिससे दोनों के बीच भारी लैंगिक भेद का पता चलता है। पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या 125.4 लाख कम है, जबकि आबादी में महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत के करीब है। ये आंकड़े राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में दुर्भाग्यपूर्ण गिरावट को दर्शाते हैं। गौर करने की बात है, वर्ष 2013 के चुनावों में पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या 109.7 लाख कम थी। सबसे समृद्ध पंजाब प्रांत में ही करीब 10 लाख महिलाएं हैं, जो वर्ष 2018 में मतदाता पंजीकरण से वंचित थीं। ज्यादा आश्चर्यजनक यह कि पंजाब की राजधानी लाहौर में ही महिला मतदाताओं की संख्या 6,16,945 कम है। यह संख्या इसलिए भी ज्यादा हो सकती है, क्योंकि देश के अन्य कई जगहों की तुलना में लाहौर की आबादी ज्यादा है। यह लैंगिक भेद और महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी से निरंतर वंचित रखने की प्रक्रिया उन ढांचागत असमानताओं को दर्शाती है, जो बहुसंख्य महिलाओं के लिए बाधक बन रही हैं। आम चुनावों से पहले चुनाव आयोग और नादरा, दोनों ने ही महिलाओं की ज्यादा भागीदारी के लिए प्रयास किए थे। चुनाव आयोग ने तीन क्षेत्रों में चुनाव रद्द कर दिए थे, क्योंकि इन इलाकों में महिलाओं ने बहुत कम वोट डाले थे। पहली बार चुनाव आयोग ने हर चुनाव क्षेत्र में कम से कम 10 फीसदी महिलाओं द्वारा मत डालने को अनिवार्य कर दिया। हमारे समाज में ऐसे कदम महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पुरुष वर्चस्व गहरे तक बसा है और महिलाओं की आवाज को बहुधा नजरंदाज या खारिज कर दिया जाता है। अब भी महिलाओं को वोट करने से वंचित करने के लिए अनेक बार कथित प्रगतिशील पार्टियां भी परंपरावादी पार्टियों के साथ हाथ मिला लेती हैं। साफ है, महिला, पुरुष और ट्रांसजेंडर जब तक समाज व कानून की निगाह में सच्चे समान स्तर पर नहीं आ जाते, तब तक समानता लाने के उपाय जारी रहने चाहिए। 

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  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 19 april