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ब्रेग्जिट क्यों?

करीब दो वर्ष से ब्रिटेन इसी मंथन में लगा है कि यूरोपीय यूनियन को कब छोड़ा जाए। उसकी राजनीति ‘कैसे’ के सवाल पर खर्च हो रही है। हालांकि इस पर कम विचार हो रहा है कि यूनियन को क्यों छोड़ा जाए। इसका सबसे सहज जवाब है- इसके लिए बहुमत ने वोट किया है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत उनकी प्राथमिकता का आदर होना चाहिए। लेकिन जब सरकार यूरोपीय यूनियन को छोड़ने या सुरक्षित ब्रेग्जिट मार्ग खोजने में विफल हो रही है, तब चुनौतियों के बारे में बिना सोचे फैसला लेना नुकसानदायक हो सकता है। हम विफलता के एक बिंदु पर हैं। 29 मार्च की प्रस्थान तिथि को आगे बढ़ाने के लिए सांसदों द्वारा की गई ताजा वोटिंग भी इसका प्रमाण है, लेकिन तिथि को आगे बढ़ाने के कारण ठीक उसी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, जैसे ब्रेग्जिट के लक्ष्य। एक और जनमत संग्रह के लिए लाए गए संशोधन को ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया, लेकिन यह विचार का अंत नहीं है। लेबर पार्टी के सांसद बच रहे हैं, कुछ अन्य सांसदों के मत भी अलहदा हैं। हालांकि इन बातों को किनारे कर दें, तो आज सांसदों का बहुमत ब्रेग्जिट के लिए प्रतिबद्ध है। दुखद है, केवल मंशा से व्यावहारिक समाधान तक नहीं पहुंचा जा सकता। वर्ष 2016 की कार्यवाही ने बताया - छोड़ो, लेकिन एक भी मकसद नहीं बताया। थेरेसा मे की अपनी व्याख्या थी। राजनेता अपने चुने हुए चश्मे से ही जनमत को देखते हैं। थेरेसा के लिए यह आव्रजन नियंत्रण से जुड़ा मामला है, तो कुछ के लिए यह अविनियमन या व्यापार सौदों पर हस्ताक्षर की शक्ति पाने का मामला है। यह कुछ ही मतदाताओं की प्राथमिकता है और इसे लोगों की इच्छा नहीं कहा जा सकता। यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय यूनियन के वास्तविक संबंधों के इर्द-गिर्द ब्रेग्जिट के पूरे सवाल पर फिर सोचना होगा। यह थेरेसा मे के दृष्टिकोण की भी विफलता है। पहले वह अपनी पार्टी में बातचीत करती हैं और उसके नतीजे को लगभग थोप देती हैं। इस तरीके से ब्रिटेन और उसके पड़ोसियों के बीच मतभेद बढ़ जाते हैं। कुल मिलाकर, संसद को ब्रेग्जिट पर फिर बहस शुरू करनी चाहिए।
 

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  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 16 march