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दागदार चुनाव


ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट यूनियन के जिस चुनाव की पिछले तीन दशकों से प्रतीक्षा की जा रही थी, क्या इस चुनाव से वह अपेक्षा पूरी हुई? अफसोस, जिस तरह का चुनाव हमें देखने को मिला, वह चिंतित ही करने वाला है। इसमें कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। ढाका यूनिवर्सिटी छात्र संघ का यह चुनाव एक मौका था कि आम अवाम का न सही, कम से कम छात्रों का भरोसा तो देश की चुनाव प्रक्रिया में बहाल हो पाए। देश के राष्ट्रीय चुनाव और मेयर के पिछले चुनाव की पृष्ठभूमि में जिस तरीके से छात्र संघ का यह चुनाव संपन्न हुआ और हमारा लोकतंत्र जिस दिशा में बढ़़ चला है, उसे लेकर गहरी चिंंता पैदा होती है। मेयर चुनाव का तो वोटरों ने ही बहिष्कार कर दिया था, जबकि उपजिला चुनाव में धांधली के आरोप लगे थे। बहरहाल, चुनाव संबंधी अनेक कानूनों के उल्लंघन के बावजूद हमें छात्र संघ चुनाव से कुछ उम्मीदें थीं कि इसमें आम छात्रों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के उपयोग का मौका मिलेगा। मगर यह शर्म की बात है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी भी बेदाग चुनाव कराने में नाकाम रही। कोई भी इससे इनकार नहीं कर रहा कि इस चुनाव में धांधली हुई है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा कैसे होने दिया गया? क्या अनियमितताएं हमारे देश के चुनावों का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं? 
जाहिर है, छात्र संघ चुनाव को लेकर भी अब दावे-प्रतिदावे किए जाएंगे, पर कोई भी यह साफ-साफ देख सकता है कि वहां मतदाताओं के मताधिकार को बाधित किया गया है। यहां तक कि पाकिस्तान के मार्शल लॉ शासन के तहत भी ढाका यूनिवर्सिटी के छात्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल अबाध रूप से करते थे। लेकिन अभी जो हमने देखा है, उसका एक ही नतीजा निकलेगा कि देश के भीतर और बाहर हमारे चुनावों की साख और धूमिल होगी। एक अहम सवाल यह भी है कि इस चुनाव ने देश के नौजवान वोटरों को क्या संदेश दिया है? आखिर वे लोकतांत्रिक सिद्धांतों की अहमियत के बारे में क्या सीखेंगे, जब शिक्षण संस्थान ही उनके वोट देने के अधिकारों की हिफाजत नहीं करेंगे?

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  • Web Title:videshi media column of hindustan on 13 March