DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

शांति समझौते र्के किंतु-परंतु

 

 

नेपाल में राजनीतिक घटनाक्रम कभी बहुत दिलचस्प नहीं रहे। पिछला दशक राजा ज्ञानेंद्र के शाही तख्तापलट के बाद दूसरे जनांदोलन का गवाह बना, जिसने ऐतिहासिक शांति समझौते का रास्ता साफ किया और करीब एक दशक से जारी माओवादी विद्रोह का अंत मुमकिन हुआ। इसके कुछ समय बाद मधेस आंदोलन ने देश के दक्षिणी मैदानी इलाके की राजनीति को केंद्र में ला दिया। फिर संविधान सभा के चुनाव और संविधान की घोषणा से राजनीतिक गठबंधनों के बनने-टूटने का सिलसिला शुरू हुआ और नेताओं को समाज के सभी तबकों की आवाज सुनने के लिए बाध्य होना पड़ा। पिछले साल सीपीएन (यूएमएल) व माओइस्ट सेंटर ने वाम गठबंधन खड़ा करने के लिए हाथ मिलाया, जिसने न सिर्फ देश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनेक राजनीतिक पंडितों को चौंकने पर मजबूर किया। पिछले हफ्ते का सियासी घटनाक्रम कम नाटकीय नहीं था। नेपाली सियासत ने एक और कलाबाजी खाई, जब गृह मंत्री राम बहादुर थापा और ‘आजाद मधेस’ अभियान के नेता सी के राउत के बीच 11 सूत्री समझौता हुआ। इस समझौते पर प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की मौजूदगी में दोनों पक्षों ने दस्तखत किए। समझौते का मुख्य बिंदु यह है कि राउत ‘आजाद मधेस’ की मांग छोड़कर मुख्यधारा की राजनीति में शिरकत करेंगे और सरकार राउत व उनके साथियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेगी। राउत पिछले छह वर्षों से मधेस लोगों के लिए आजाद मधेस की मांग करते रहे हैं, पर बीते शुक्रवार को एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने देश की संप्रभुता, अखंडता व गरिमा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। इस समझौते ने जहां राउत को ‘सुरक्षित लैंडिंग’ का मौका दिया है, वहीं के पी शर्मा ओली को भी इससे राजनीतिक लाभ मिलेगा। पर यहां सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि जिस तरह से राउत ने समझौते के तुरंत बाद सोशल मीडिया में जनमत-संग्रह की बात कही, उससे उनके इरादों पर संदेह होना लाजिमी है। इसलिए समझौते की शर्तों से जुड़े किसी भी विवाद को दोनों पक्षों को बातचीत से सुलझाना चाहिए।
    

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 12 march