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खानाबदोश जिंदगी

भू-स्खलन और बाढ़ नेपाल में लोगों के अपने गांव-घर से दर-बदर होने की बड़ी वजहें हैं। हरेक साल हजारों की तादाद में लोग कुदरती आपदाओं के कारण बेघर होने को मजबूर होते हैं और ऐसा ज्यादातर मानसून के चार महीनों में होता है। भू-स्खलन जहां पहाड़ के लोगों को विस्थापन के लिए विवश करता है, तो वहीं बाढ़ तराई के इलाकों को। गृह मंत्रालय द्वारा जारी ‘नेपाल डिजास्टर रिपोर्ट-2017’ के मुताबिक, वित्त वर्ष 2015-16 में जहां 2,628 घर बाढ़ में बढ़ गए, तो वहीं भू-स्खलनों ने 7,141 घरों को ध्वस्त कर दिया। रिपोर्ट यह भी बताती है कि इस अवधि में प्राकृतिक आपदाओं के कारण देश को लगभग 1.28 अरब का माली नुकसान उठाना पड़ा। लगभग 377 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। ये आंकडे़ साल-दर-साल देश को होने वाले नुकसान के पैमाने बताते हैं। बहरहाल, ऐसे ज्यादातर विस्थापित परिवारों को वर्षों तक मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं, क्योंकि उनकी तकलीफों के प्रति सरकार का रवैया बेहद उदासीनता भरा रहा है। गृह मंत्रालय प्रभावित परिवारों के बचाव और उनकी फौरी मदद के लिए देश-विदेश से दान बटोरता रहता है, लेकिन जैसे ही बरसात का मौसम खत्म होता है, वह कान में तेल डालकर सो जाता है। ऐसे में, ज्यादातर विस्थापित परिवार सड़क किनारे या अस्थाई शिविरों में इस उम्मीद में पड़े रहते हैं कि सरकार उन्हें किसी सुरक्षित जगह पर बसाएगी। बहराताल रूरल म्युनिस्पैलिटी के पंथारी, तारंगा व सरखेत के हरिहर गांव के 300 से अधिक परिवारों की बदहाली इसका ठोस उदाहरण है। अगस्त 2014 में इनके घर बाढ़ में बह गए थे। तभी से ये बीरेंद्रनगर के अस्थाई शिविरों में पड़े हैं। करीब पांच महीने पहले करनाली प्रांत ने इनकी सुध लेने के लिए एक समिति गठित की है, जिसने अब आंकड़ा जुटाने का काम शुरू किया है। यह समिति कब रिपोर्ट तैयार करेगी, और कब राज्य सरकार उनके भविष्य को लेकर कोई कदम उठाएगी, यह सब अभी अधर में है। सरकार को इस दिशा में तेजी से फैसले करने चाहिए, ताकि विस्थापित लोग भी सामान्य जिंदगी जी सकें।

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  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 11 january