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सुरक्षा चुनौतियां और कूटनीति

बीते कुछ दिनों में पाकिस्तान ने तीन आतंकी हमले झेले हैं। दो बलूचिस्तान और एक खैबर पख्तूनख्वा में। मुल्क में दहशतगर्दी की वारदातों में तेज गिरावट के बावजूद ये दोनों सूबे अब भी आतंकियों के निशाने पर हैं। खासतौर से बलूचिस्तान में अतिवादी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रहीं और इलाके में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीएलपी) के साथ-साथ तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आईएस) का प्रभाव बढ़ रहा है। ये वारदातें बलूचिस्तान के पिशिन और पंजगुर में हुईं, जिन्हें विस्फोटक उपकरण आईईडी से अंजाम दिया गया। इससे उन तमाम लोगों की चिंता बढ़ गई है, जिन्होंने आर्मी पब्लिक स्कूल में खत्म हुई मासूम जिंदगियों का अभी मातम मनाया है। पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ पीस स्टडीज द्वारा जारी 2018 की सिक्योरिटी रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षा के लिहाज से पाकिस्तानी तालिबान और दाएश (आईएस) सबसे बड़े खतरे हैं। रिपोर्ट में इसकी भी पुष्टि की गई है कि बलूचिस्तान एकमात्र ऐसा इलाका है, जहां 2017 की तुलना में बीते साल आतंकी वारदातों में जान गंवाने वालों में 23 फीसदी का इजाफा हुआ है। अब जबकि हमारा मुल्क फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे-लिस्ट में आ चुका है, क्योंकि हमारे नीति-नियंताओं ने आतंकी जमातों से निपटने के लिए माकूल कदम नहीं उठाए, तो जरूरी यही है कि हुकूमत इस हालात से निपटने के लिए फौज के साथ मिलकर उचित प्रयास करे। सबसे पहले तो शायद यह स्वीकार करने की जरूरत है कि इस क्षेत्र में आईएस मौजूद है। हालांकि ये वे आईएस लड़ाके नहीं हैं, जो सीमा पार करके यहां आए हों, बल्कि इन दहशतगर्दों ने टीएलपी से अपनी निष्ठा आईएस में बदल ली है। अमेरिका से हमारा कूटनीतिक रिश्ता सिर्फ अफगानिस्तान के हालात और तालिबान से शांति-वार्ता तक सिमटा हुआ है। ऐसे में, जरूरी यह है कि एनएपी (नेशनल एक्शन प्लान) सख्ती से लागू हो, एसपी ताहिर डावर की हत्या की जांच हो और कूटनीतिक सुधार के लिए फौज को एक नई सुरक्षा योजना तैयार करने के बास्ते प्रोत्साहित किया जाए।

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  • Web Title:videshi media article on hindustan on 9 january