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ट्रंप की फलस्तीन नीति

इजरायल 1948 में बनाया गया था, इसलिए अमेरिका इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण किरदार रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति समझौते का आगाज किया था, उन्होंने इजरायल को सुरक्षा गारंटी दी थी और फलस्तीनियों को आश्वासन दिया था कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। लेकिन अब यहां भड़कती चिनगारियां किसी भी समय दावानल में बदल सकती हैं। डोनाल्ड टं्रप फायर फाइटर की बजाय उसका कारण बनते अधिक दिख रहे हैं। टं्रप प्रशासन ने फलस्तीनियों को दी जाने वाली मदद में कटौती की है। पचास लाख फलस्तीनी शरणार्थियों को मदद देने वाली संयुक्त राष्ट्र्र की एजेंसी में भी उन्होंने अमेरिका का योगदान कम कर दिया है। इन कटौतियों का असर पहले ही लाखों लोगों पर पड़ चुका है। रिपोर्ट बता रही है कि राष्ट्रपति ट्रंप ऐसी सारी फंडिंग रोक देना चाहते हैं। यह अराजकता के लिए एक नुस्खा है। उन पांच लाख बच्चों का क्या,  जिनके पढ़ने-लिखने का इंतजाम यह एजेंसी करती है? और उन लोगों का क्या होगा, जिनके भोजन का इंतजाम भी इसी मदद से होता है। इस एजेंसी की कुलजमा मदद में एक चौथाई से भी ज्यादा हिस्सेदारी अमेरिका की होती है। टं्रप की नीतियां दुनिया की सुरक्षा और स्थिरता को जोखिम में डाल रही हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत, निकी हेली ने कहा है कि फलस्तीनी शरणार्थियों की वापसी का अधिकार, फलस्तीनियों व इजरायल की अनाथाश्रम की मांग, इन सबको समझौते की सूची से बाहर होना चाहिए। यह इस खतरनाक क्षेत्र में एक खतरनाक कदम होगा। ट्रंप एक तरफ संघर्ष खत्म करने के लिए इस सदी का सबसे अच्छा समझौता कराने का दावा कर रहे हैं, जबकि हकीकत में, समझौते पर कोई पारस्परिक रूप से सहमत नहीं दिख रहा। पिछले 70 वर्षों में, फलस्तीनियों ने बाहरी लोगों द्वारा थोपे गए किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया, जो सीमा-रेखाओं को दोबारा खींचे जाने की बात करता हो और बिना जनमत के संप्रभुता को परिभाषित करने का दबाव डालता हो। ट्रंप अगर सोचते हैं कि वे ऐसा कर पाएंगे, तो वह गलत हैं।

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  • Web Title:The Guardian article in Hindustan on 03 September