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8 अप्रैल, 2020|6:55|IST

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विवादों के बीच रिश्ते

बेल्ट ऐंड रोड फोरम का समापन बेहतर नतीजों के साथ हुआ। अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने इसमें शिरकत की, जो यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन्फ्रास्ट्रक्चर-निर्माण की इस पहल को लेकर सकारात्मक रुख रखता है। भारत इससे दूर रहा। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि भारत ऐसी किसी भी परियोजना को कुबूल नहीं कर सकता, जो उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करे। साफ है, भारत एकमात्र मुल्क है, जिसने इस योजना पर ऐतराज जताया है।

नई दिल्ली की नाराजगी मूलत: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर है, जो पाकिस्तान-नियंत्रित कश्मीर से होकर गुजरता है। भारत और पाकिस्तान के कश्मीर पर अपने-अपने दावे हैं और यह अभी दोनों के नियंत्रण में है। चीन कश्मीर विवाद को भारत व पाकिस्तान का आपसी मसला मानता रहा है और इसमें किसी तरह की दखलंदाजी का ख्वाहिशमंद नहीं है। लिहाजा यह गलियारा विशुद्ध रूप से आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए तैयार किया जा रहा है, किसी राजनीतिक विवाद को खड़ा करने के उद्देश्य से नहीं। दरअसल, भारत में राष्ट्रवाद के उभार ने वहां के जनमानस को चीन से जुड़े मसलों को लेकर खासा संवेदनशील बना दिया है।

वे विकास व तरक्की जैसे मामलों में चीन से तुलना करना चाहते हैं, पर दूसरी तरफ उन्हें हमारा पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाना मंजूर नहीं है। उन्हें लगता है कि भारत को लक्ष्य करके यह संबंध बेहतर बनाया जा रहा है। अगर भारत खुद को बड़ी ताकत मानता है, तो उसे चीन के साथ मतभेदों का आदी होना चाहिए और इनके बीच ही संबंध सामान्य बनाने चाहिए। दो बड़े देश तमाम मसलों पर समझौता कर लें, यह मुमकिन नहीं।

चीन और अमेरिका के रिश्ते से हम इसे समझ सकते हैं कि तमाम विवादों के बीच भी दोनों सहज द्विपक्षीय रिश्ते बनाने में सफल रहे हैं। वैसे भी, चीन और भारत के संबंधों में कभी उतनी गिरावट नहीं देखी गई है। दोनों देशों की सीमाएं हाल के वर्षों में शांत ही रही हैं। अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर दोनों ने आर्थिक व सामाजिक विकास किए हैं। लिहाजा दोस्ताना संबंध बनाना दोनों देशों के हित में ही है।