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एक बहादुर महिला का जाना

वर्ष 2000 की बात है। सैन्य तानाशाही से मोर्चा लेने वाले वाहनों के जुलूस में एक महिला कार में बैठी हुई थी। सैनिक तानाशाही के खिलाफ वह एक ऐसा गतिरोध था, जो कम से कम दस घंटे चला। सैकड़ों पुलिस वाले उस महिला से सरेंडर करवाने की कोशिश करते रहे, आखिर में नाकाम होकर कार को क्रेन से खिंचवा दिया। यह बेगम कुलसुम नवाज थीं, जो निर्वासित पति के समर्थन में अकेले ही सैनिक तानाशाही से मोर्चा लेने निकल पड़ी थीं। जिस किसी ने उन लम्हों में कुलसुम को देखा है, उसके जेहन में वह बेखौफ छवि आज भी दर्ज होगी। पाकिस्तान के इतिहास में तानाशाही के सामने डटकर यूं खडे़ होने की यह नायाब मिसाल है। कश्मीरी परिवार में जन्मी कुलसुम 1990-93, 1997-2000 और फिर 2013-2017 में प्रथम महिला रहीं, यानी पूरे तीन दशक तक सक्रिय राजनीतिक विरासत का हिस्सा रहीं। अगस्त 2017 में उन्हें लिम्फोमा के इलाज के लिए लंदन ले जाया गया, जहां जुलाई में दिल के घातक दौरे के बाद उनकी स्थिति नाजुक हो गई थी, जो बीती रात उनकी मौत का कारण बनी। बेगम कुलसुम महज एक मां या एक पत्नी नहीं थीं। जुझारू भूमिका की बजाय गृहस्थ भूमिका चुनी, तो पति की राजनीतिक लड़ाई में हमेशा मजबूत स्तंभ की तरह साथ दिखीं, तब भी जब नवाज पार्टी में अकेले पड़ने लगे थे। रूढ़िवादी परिवार से होने के बावजूद राजनीतिक गलियारों में उस वक्त भी निकलने से नहीं चूकीं, जब पार्टी के कुछ लोग भी सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। पति के निर्वासन के बाद पार्टी हाईकमान की कुशल भूमिका और लोकतंत्र बहाली आंदोलन का नेतृत्व अपने आप में मिसाल है। जबर्दस्त पितृ-सत्तात्मक आग्रहों वाले समाज से निकली ऐसी महिलाओं ने असाधारण रूप से मजबूती और अविश्वसनीयता की हद तक प्रतिबद्धता की मिसाल भी पेश की है। हमें फामिमा जिन्ना, नुसरत भुट्टो और अब बेगम कुलसुम जैसी महिलाओं की विरासत का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाई।

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  • Web Title:Pakistan The Nation article in Hindustan on 13 september