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यह शुरुआत तो ठीक नहीं

यह उस आदर्श से बहुत दूर है, जिसका पीटीआई ने भरोसा दिलाया था। वादा तो सत्ता में आने के बाद पुलिस सुधारों और सुरक्षा बलों की मजबूती का था, लेकिन यहां तो उम्मीदें शुरुआत में ही टूटती दिख रही हैं। वादा था कि सुधारों की शुरुआत खैबर पख्तूनख्वा से होगी, जहां पार्टी 2013 से सत्ता में है, लेकिन वहीं के एक बदनुमा मामले ने पार्टी और प्रधानमंत्री इमरान खान के इरादों, किसी भी सूरत में सिद्धांतों से समझौता न करने के संकल्पों को उनके गढ़ में ही झटका दिया है। पाकपट्टन की यह घटना उम्मीद बांधे बैठी जनता के लिए सदमे की तरह है। वहां के पुलिस प्रमुख को प्रधानमंत्री की पत्नी बुशरा बीबी के पूर्व पति के साथ कथित बदसुलूकी के मामले में हटा दिया गया है। विशिष्टता बोध का यह वही मामला है, जिसमें लोग खुद को कानून से ऊपर मान बैठते हैं और सिस्टम को अपनी कठपुतली समझते हैं। यह मामला तो बस एक नई नजीर है। इमरान ने चुनाव से पहले ही नहीं, सत्ता संभालने के बाद भी बड़ी उम्मीदें जगाईं। वादा था कि सत्ता में आते ही वह देश को अब तक बंधक बनाए रखने वाले भूतों को वापस ताबूत में जाने को मजबूर कर देंगे, लेकिन दिख कुछ और रहा है। इसे अच्छा तो नहीं कहेंगे कि पार्टी और उसके सर्वोच्च नेता का नाम ऐसे मामले में आया, जो शर्मिंदा करने वाला है। वह भी तब, जब उन्हें सत्ता में आए चंद रोज ही हुए हैं। हालांकि अगर इस मामले के सारे तथ्य सही हैं, तो मानना चाहिए कि सत्तारूढ़ पार्टी ने एक बड़ा अवसर गंवा दिया। जनता ही नहीं, अपनी जमात को भी संदेश देने का यही सही मौका था। पुलिस फोर्स और नौकरशाही के साथ आम कर्मचारी का मनोबल ऊंचा हो जाता, अगर यह संदेश जाता कि अब उन्हें कोई अपनी कठपुतली नहीं बना पाएगा। यह उन्हें उस कुंठा से भी बाहर निकालने में मददगार होता, जब वे तय ही नहीं कर पाते कि कानून का पालन कराएं, तो कैसे? वीआईपी कल्चर भाषणों से नहीं, दृढ़ इच्छाशक्ति से खत्म होता है। ऐसी घटनाएं अगर जारी रहीं, तो ‘नए पाकिस्तान’ का सपना टूटते देर नहीं लगेगी, इमरान साहब।

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  • Web Title:Pakistan Dawn article in hindustan on 30 august