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यौन उत्पीड़न का भयावह सच

पाकिस्तान में महिलाएं न सिर्फ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकार हैं, बल्कि उन्हें इस चिंता के साथ भी जीना पड़ता है कि मुंह खोलने पर उन्हें अलग तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी। इसका कारण कार्यस्थलों पर लैंगिक अनुपात का असंतुलन और महिलाओं का करियर व उनका मान-सम्मान पुरुष हाथों में गिरवी रखा होना भी है। डॉन  की एक रिपोर्ट में कानून, चिकित्सा और शिक्षा से जुड़ी महिलाओं ने बताया कि किस तरह उन्हें अवांछित फोन कॉल्स, लैंगिक टिप्पणियों, यौन संबंधों की शर्त पर प्रोन्नति के वादे जैसे अवांछित और आपत्तिजनक हालात से गुजरना पड़ा है। इस देशव्यापी सर्वे का निष्कर्ष बताता है कि यौन उत्पीड़न के मामलों की जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा भयावह है, जैसा कि आमतौर पर धारणा है। सर्वे में शामिल 82 फीसदी औरतों का मानना था कि पुरुष ऐसे आचरण के बावजूद आसानी से बच जाते हैं, लेकिन महिलाओं को तो हर जगह आर्थिक, सामाजिक और पेशागत चुनौतियां झेलनी पड़ती हैैं। हालात की भयावहता समझने के लिए एक मेडिकल छात्रा और एक टीचर की यह स्वीकारोक्ति काफी है कि अपनी नौकरी व प्रतिष्ठा के दबाव में वे ऐसे ही मामलों में शिकायत नहीं कर सकीं। कई छात्राओं ने तो ग्रेड बढ़ाने के नाम पर यौन उत्पीड़न की बात स्वीकार की। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए 2010 में कानून तो बना, पर क्रियान्वयन की शिथिलता के कारण खास असर नहीं डाल सका। सर्वे बताता है कि माहौल का ही असर है कि महिलाएं चाहकर भी आंतरिक जांच कमेटियों के सामने नहीं आ रहीं। सच है कि शैक्षिक संस्थाओं या दफ्तरों में यौन उत्पीड़न की सुनवाई के लिए कानूनी रूप से सेल बनाने का नियम है, मगर निगरानी के अभाव में शायद ही इसका कहीं पालन होता हो। यह तभी होगा, जब कानून व क्रियान्वयन, दोनों सख्त हों। यह सब करते वक्त फैक्टरियों या ठेके पर काम करने वाली महिलाओं का खास ध्यान रखा जाना चाहिए, जो पहले से ही हालात की शिकार हैं और ऐसे में, उनके मुंह खोलने की बात सोचना भी कल्पना से परे है।

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  • Web Title:Pakistan Dawn article in hindustan on 22 march