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महज चार पदक

जकार्ता में हाल ही में संपन्न एशियाई खेलों में पाकिस्तानी खिलाड़ियों की जैसी फजीहत हुई, वह किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं। तथ्य यह है कि 358 सदस्यीय दल अपने हाथ में महज चार पदक, वह भी कांस्य लेकर लौटा, जो देश के बुरी तरह गिरते खेल-स्तर का प्रमाण है। ऐसा भी नहीं है कि यहां के खेल प्रशासन के सामने एशियाड की चुनौती अचानक आ गई हो। उसके पास पर्याप्त समय था, लेकिन सच यही है कि किसी भी खिलाड़ी को तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। खेलों को मजाक बनाकर रख दिया। दुर्भाग्यपूर्ण है कि खेल रणनीति पर काम करने, खिलाड़ियों और उनकी परफॉरमेंस पर ध्यान देने की बजाय खेल प्रशासक अपना कार्यकाल विस्तार कराने में लगे रहे और सरकार अपने दिन गिनती रही। कड़वी सच्चाई यह भी है कि पाकिस्तान के खेल गलियारों में चलने वाले सत्ता-संघर्ष और बाहर से प्रशासनिक लालफीताशाही, राजनीतिक हस्तक्षेप, हितों के टकराव और भ्रष्टाचार ने बीते कुछ वर्षों में ऐसा गठजोड़ बनाया कि खेल ढांचा ही चरमराकर रह गया। ढांचागत दोष बढ़ने के साथ ही खेल प्राथमिकताएं पीछे होती गईं, नतीजा न तो तार्किक घरेलू खेल कलेंडर बन सका और न ही अन्य जरूरी न्यूनतम प्रयास हुए। कुछ नहीं हुआ, तो प्रायोजक भी नहीं मिले। नतीजतन, आर्थिक पक्ष भी चरमरा गया। इन खेलों में हमारी एकमात्र उपलब्धि कराटे में नरगिस का कांस्य रहा, बाकी तीनों पदक कबड्डी, स्क्वैस और जैवलिन थ्रो में थे। आश्चर्य नहीं कि हॉकी टीम भी एक बार फिर खाली हाथ लौटी और अब 2020 के टोक्यो ओलंपिक के लिए उसे खासी मशक्कत करनी होगी। पाकिस्तान में हॉकी लंबे समय से म्यूजिकल चेयर का खेल बनकर रह गई है और यदि यह कहा जाए कि हमारे ओलंपियंस ने भी इसकी गरिमा घटाने में कसर नहीं छोड़ी, तो अतिशयोक्ति न होगी। लेकिन अब इसका इलाज हो जाना चाहिए। नई सरकार के सामने तमाम अन्य बातों के साथ देश की खोई हुई खेल-गरिमा और खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को वापस लाना बड़ी चुनौती है। 

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  • Web Title:Pakistan Dawn article in hindustan on 05 september