Nepal Newspaper The Himalayan Times Article in Hindustan Hindi Newspaper 19th of September - स्वार्थ से भरा कदम DA Image
22 नवंबर, 2019|12:38|IST

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स्वार्थ से भरा कदम

मौजूदा सांसदों का चार साल का तय कार्यकाल खत्म होने में अब महज 37 दिन बचे हैं। मगर अपने लिए वेतन व भत्ते जैसे लाभ पाने के लिए उन्होंने लॉबिंग तेज कर दी है। जैसे, कार्यकाल खत्म होने के बाद भी स्वास्थ्य व परिवहन सुविधाएं हासिल करने के लिए विधेयक पेश करना। प्रस्तावित विधेयक पूर्व राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधीश, संविधान सभा-अध्यक्ष,  नेशनल असेंबली के अध्यक्ष सहित तमाम पूर्व वीवीआईपी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। फिलहाल यह राज्य मामलों की संसदीय कमेटी के पास विचाराधीन है। पर यदि पूर्व सांसदों को मासिक पेंशन और स्वास्थ्य व परिवहन जैसी सुविधाएं दी जाती हैं, तो निश्चय ही देश की अर्थव्यवस्था पर इससे भारी बोझ पडे़गा। 2057 विक्रम संवत में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसदों को किसी भी तरह की सुविधा न देते हुए अपने आदेश में यह कहा था कि वे समाज सेवक हैं और उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद किसी लाभ की उम्मीद नहीं पालनी चाहिए।

नए विधेयक में पूर्व राष्ट्रपति के लिए 50,000 रुपये और पूर्व उप-राष्ट्रपति के लिए 40,000 रुपये मासिक भत्ता का प्रावधान तो है ही, राजधानी में घर न रहने की सूरत में पूर्व राष्ट्रपतियों के लिए दो लाख रुपये व दूसरे सेवानिवृत्त रसूखदारों के लिए 75,000 रुपये मासिक भत्ता की भी बात है। इसके अलावा, तमाम दूसरी सुविधाओं का जिक्र भी इस विधेयक में है। अब सवाल यह है कि करदाताओं के पैसे से आखिर उन्हें ऐसी सुविधाओं की दरकार क्यों है? पद छोड़ने के बाद राष्ट्रीय मामलों में जब उनकी कोई औपचारिक भूमिका होती ही नहीं, तो फिर उन्हें खर्चीली सुविधाएं क्यों मिलनी चाहिए? नेशनल कांग्रेस के कुछ संसद सदस्यों का कहना है कि पुराने सांसदों की स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च देश को वहन करना चाहिए। सवाल यह है कि अगर उन्हें यह सुविधा चाहिए, तो फिर आम लोगों को भी सरकारी अस्पतालों में ये तमाम सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए? वैसे, इस मसले का एक उपाय है। स्वास्थ्य बीमा का चलन दुनिया भर में है, तो क्या हमारे यहां भी जनसेवकों के लिए ऐसी पॉलिसी लेना अनिवार्य नहीं बना देना चाहिए?   

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