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अलोकतांत्रिक पहल

यह नई बात नहीं रही कि देश की सिविल सेवाओं की बदहाली का कारण इनका राजनीतिकरण रहा है, जिसमें 1990 में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू होने के बाद तेजी आई। सिविल सेवाओं में सभी राजनीतिक दलों से संबद्ध ट्रेड यूनियनों की मौजूदगी ने गुटबाजी बढ़ाई, जिसका असर सेवाओं पर पड़ा। वर्तमान सरकार इस समस्या के तोड़ के रूप में एक बिल लेकर आई है, जिसमें दलों से संबद्ध यूनियनों को खत्म कर एक केंद्रीय यूनियन बनाने का प्रस्ताव है। जमीनी तौर पर शायद अच्छा लगे, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। पूरी नौकरशाही या व्यावसायिक लोगों के विशाल समूह को एक मंच पर लाकर किसी मुद्दे पर एकराय बनाने की बात, उन्हें मजबूर करने जैसा है। एक सही लोकतंत्र अपने नागरिकों को मुद्दों के आधार पर सोचने और खुद को व्यवस्थित करने का अधिकार देता है, इसका सम्मान होना चाहिए। जरूरत नौकरशाही के राजनीतिकरण के कारणों और हालात के विश्लेषण की है, जिस पर नजर डालते ही समझ में आ जाता है कि इसके पीछे नौकरशाही की स्वार्थसिद्धि की भावना नहीं, बल्कि असल जिम्मेदार राजनेता और राजनीतिक दल रहे हैं, जिन्होंने अपने निहित स्वार्थों के चलते इस संस्था को बर्बाद किया। सब जानते हैैं कि 1990 के दशक में नेपाली कांग्रेस, सीपीए-यूएमएल और बाद के दिनों में माओवादियों ने भी नौकरशाही का कैसा-कैसा इस्तेमाल किया। नवगठित नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के घटकों यूएमएल और माओवादियों ने तो इसका अपार फायदा उठाया है। इस पृष्ठभूमि में तो एनसीपी का प्रस्ताव संदेह ही जगाता है। जरूरत नौकरशाही में राजनीतिक दखलंदाजी कम कर, इसकी शुचिता और पारदर्शिता बहाल करने की है, न कि अलोकतांत्रिक तरीके से यूनियनों का अस्तित्व खत्म करने की। लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किए बिना भी बहुत कुछ किया जा सकता है। विभिन्न यूनियनों के बीच विमर्श के लिए एक वृहद यूनियन का प्रस्ताव हो सकता है।  सबसे खराब चीज यूनियनों को खत्म करने का इरादा है, जिससे बचना होगा।

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  • Web Title:Nepal Kathmandu Post article in Hindustan on 31 may