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कानून लागू होना जरूरी

बीते महीने नेपाली संसद ने दो अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए। सामाजिक सुरक्षा विधेयक और श्रम संबंधी विधेयक। सामाजिक सुरक्षा विधेयक को पेश करने और श्रम कानून 1992 में सुधार की प्रक्रिया करीब ढाई दशक पहले ही शुरू हुई थी। तब डेढ़ दशक पुराने श्रम कानून को कई कारणों से नाकाफी माना जाना लगा था, खासतौर से नियोक्ताओं के हितों की अनदेखी के कारण। यह सही है कि रोजगार के अवसर सृजित करने वाले नियोक्ता अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके हितों की रक्षा में कर्मचारी की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। यह उस वक्त की बात है, जब सरकार ने नियोक्ताओं के हित में लचीले श्रम कानून के बारे में सोचते वक्त श्रमिक  हितों से संतुलन के लिए सामाजिक सुरक्षा विधेयक की भी बात की। संयोग है कि दोनों बिल लगभग साथ-साथ पास भी हुए। नए श्रम कानून के प्रावधानों में ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ भी है। नियोक्ता बार-बार होने वाली हड़तालों के मद्देनजर लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे, जबकि श्रमिक पूरे वेतन को अपना हक मानते हैं।

नया श्रम कानून नियोक्ता के हित साधता ज्यादा दिख रहा है, जो उसे परफॉरमेंस के आधार पर और कंपनी के वित्तीय बोझ की स्थिति में छंटनी के अधिकार देता है। श्रमिक के लिए नौकरी जाने या वेतन कटौती से बड़ा कोई कष्ट नहीं होता। हालांकि सरकार ने श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना का सदस्य बनना अनिवार्य करके इसकी भरपाई करने की कोशिश की है। इसमें कर्मचारी के लिए ऐसे हालात में मुआवजे का प्रावधान है। ऐसे में, माना जाना चाहिए कि दोनों विधेयक कर्मचारी व नियोक्ता, दोनों के लिए उतने ही काम के होंगे। इससे देशी-विदेशी निवेशक भी आश्वस्त होंगे और यह भविष्य में रोजगार और उद्योग, दोनों के लिए यह बेहतर साबित होगा। पर नेपाल में सिर्फ कानून बना देने से सब कुछ आसान नहीं हो जाता। असल बात कानून को सख्ती से लागू करने में है, जिसमें नेपाल आमतौर पर पिछड़ जाता है। इससे कई बार सरकार भी मुश्किल में फंसती है, जनता तो पिसती ही है। सरकार को इस बार सख्ती से आना होगा, वरना नेपाल की दशा सुधारने का सपना, सपना रह जाएगा।

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  • Web Title:Kathmandu Post Article on Nepal Constitution in Hindustan Hindi News Paper 22nd of August