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तालिबान पर अविश्वास 

विश्वास करें, लेकिन जांच लें- इस रूसी मुहावरे को अपने समय में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन हमेशा सही ठहराते थे। उन्होंने सोवियत संघ के साथ परमाणु वार्ताओं मेें इसका बहुत प्रभावी उपयोग किया था। बहरहाल, अमेरिका 11 सितंबर, 2001 हमले की एक और दुखद बरसी मना रहा है। ऐसे में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अफगानिस्तान में तालिबान से निपटते हुए इस मुहावरे को ध्यान में रखना चाहिए, यानी जांच करें और उसके बाद ही विश्वास करें। प्रतिकूल हालात से निपटने का इससे बेहतर दूसरा कोई तरीका नहीं है। 9/11 के हमलावरों को जिन लोगों ने पाला-पोसा, उन कट्टरपंथियों को सबक सिखाने के लिए जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अमेरिका सेना को अफगानिस्तान में उतारा था, तब से लेकर आज तक उस जमीन पर अमेरिकी सैनिक जान गंवाते रहे हैं। इस दर्दनाक युद्ध से ऐसे पीछे हटना एक तरह से उन लोगों को माफ करना होगा, जो लगातार लड़ रहे हैं और 2001 के बाद से 2,300 अमेरिकी सैनिकों को शहीद कर चुके हैं। इसी वर्ष अब तक वहां 16 अमेरिकी सैनिक शहीद हुए हैं, लेकिन दुश्मन अभी भी शिकंजे में नहीं आए हैं।

काबुल में हाल ही में एक हमला हुआ, जिसमें 10 अन्य लोगों सहित एक अमेरिकी सैनिक शहीद हो गया, इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति तालिबान और अफगानी नेताओं से होने वाली शांति वार्ता से पीछे हटने को मजबूर हो गए। ट्रंप ने कहा कि ये लोग वार्ता में अपनी मजबूती दिखाने के लिए हत्या कर रहे हैं, ये कैसे लोग हैं? ट्रंप को पूरी सावधानी से कदम बढ़ाने चाहिए। कुछ रिपब्लिकन पहले ही यह सवाल उठा रहे थे कि राष्ट्रपति 9/11 से ठीक पहले उन लोगों के साथ बैठकर कैसे बात करेंगे, जिन्होंने ओसामा बिन लादेन और अल कायदा को पाला-पोसा था। रिपब्लिकन लिज चेनी ने ट्वीट करके कहा, ‘कैंप डेविड वह जगह है, जहां 9/11 हमले और 3,000 अमेरिकियों की मौत के बाद अल कायदा के खिलाफ कार्रवाई की योजना बनाने के लिए अमेरिकी नेता जुटे थे, उस जगह पर किसी तालिबान के कदम नहीं पड़ने चाहिए।’ वह सोलह आना सही हैं। 

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  • Web Title:hindustan international media column on 12th September