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तियानमेन चौक 

यह अपरिहार्य है, हम इतिहास को वर्तमान के चश्मे से देखते हैं। हम मानते हैं कि जो वर्तमान स्थिति है, केवल वही संभव है और हम समान निश्चितता के साथ भविष्य देख सकते हैं। 3-4 जून, 1989 को बीजिंग में सुधार समर्थक प्रदर्शनों पर हुए खूनी प्रहार की स्याह यादें ताजा हो गई हैं। चीन में आज भी कुछ लोग खोई हुई उस आशा और मारे गए दोस्तों व बच्चों का शोक मनाते हैं। तब बीजिंग और अन्य शहरों में दो सप्ताह तक हुए प्रदर्शनों ने लोगों में बदलाव की तमन्ना को साबित कर दिया था। उम्मीद थी कि चीन 40 वर्ष के कड़े कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ से अलग नई राह पर चलेगा, लेकिन सैकड़ों छात्रों, मजदूरों और अन्य लोगों की हत्या ने तय कर दिया कि चीन को किस राह पर चलना है।

ज्यादातर छात्रों को उम्मीद नहीं थी कि उनके नेता गोलियां चलवाएंगे। जब गोलियां चलने लगीं, छात्रों को शुरू में लगा कि रबड़ की गोलियां हैं, लेकिन तब चीन की एक ही मर्जी थी और उसके प्राधिकारियों ने आतंक का रास्ता चुना। तब भी अनेक विश्लेषकों का मानना था कि यह विद्रोह कुछ समय की बात है।

आज चीन में अनेक लोग बहुत संपन्नता का उपभोग करते हैं। कई मायने में व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी बढ़ी है। चीन में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी को जैसा समर्थन प्राप्त है, वैसा अनेक चुनी हुई सरकारों को भी प्राप्त नहीं है। वर्ष 1989 में प्रदर्शन में भाग लेने वाले कई लोग अब कहने लगे हैं कि चीनी नेताओं की कार्रवाई जरूरी थी। युवा पीढ़ी में ज्यादातर को तो पता भी नहीं है कि ऐसा कुछ हुआ था। उस घटना का दुनिया में कड़ा विरोध हुआ था, लेकिन वह ज्यादा समय नहीं टिक सका। चीन ने विकास किया, तो ज्यादातर देश इस नतीजे पर पहुंचे कि चीन नहीं बदलेगा और उसे बदलने के चक्कर में अपना व्यावसायिक हित क्यों छोड़ा जाए। तियानमेन चौक विद्रोह ने बताया था कि अनपेक्षित और अकल्पनीय भी संभव है। हम उन घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं देखेंगे, लेकिन हमें यह कहकर स्वयं को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए कि हमने भविष्य देख लिया है। 
 

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  • Web Title:Hindustan Foreign Media June 4