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चीन की आशा

चीन ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं को हमेशा ही बहुत महत्व दिया है। चीन आश्वस्त रहा है कि वार्ताओं में नेकनीयती से ही किसी ऐसे अंतिम समझौते तक पहुंचा जा सकता है, जिसका आधार परस्पर सम्मान और समान व्यवहार हो। अमेरिका ने पहले स्वयं स्वीकार किया था कि 10 दौर की वार्ताओं में समझौता धीरे-धीरे आकार ले रहा था, तो फिर यह सवाल पूछना जायज होगा कि अमेरिका ने व्यापार गतिरोध क्यों बढ़ाया? चीन पर आरोप लगाते हुए वाशिंगटन ने बीजिंग पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है।

अमेरिकी प्रशासन ऐसे किसी समझौते तक पहुंचने की इच्छा नहीं रखता, जिसमें वह स्पष्ट विजेता न हो। वैसे स्वाभाविक है कि दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से टकराएंगी। अब तक चीन-अमेरिका संबंधों में उतार-चढ़ाव ने यह दिखाया है कि जब संबंध गतिरोध विहीन होते हैं, तभी दोनों देशों को लाभ होता है। अमेरिका अपनी कोशिशों में निराश ही होगा। उसकी कार्रवाइयों की छाया आपसी संबंधों पर पड़ेगी, लेकिन चीनी अर्थव्यवस्था टिकाऊ है, दबाव झेल लेगी।

वॉशिंगटन की बदमाशी को बीजिंग नहीं सहेगा, हालांकि चीन ने अपने द्वारा तैयार प्रतिक्रिया की विस्तार से घोषणा नहीं की है। चीनी राष्ट्रपति ने भी यही कहा है कि विवाद दोनों देशों के संबंधों को नुकसान पहुंचाएगा, परस्पर सहयोग ही विद्वतापूर्ण मार्ग होगा। इसीलिए चीन ने आगे वार्ताओं के लिए दरवाजे खुले रखे हैं। अमेरिका को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह चीन को झुकने के लिए मजबूर कर सकता है। बल्कि उसे उस सेतु में अंतिम ईंटों को जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए, जिसे वार्ताकारों ने बहुत कोशिशों से तैयार किया है।

शायद इसके लिए अमेरिकी प्रशासन की प्रकृति में बदलाव की जरूरत पड़ेगी। यह प्रशासन अमेरिका को सबसे आगे रखने के लिए दूसरों को मजबूर करता है, जबकि दूसरों को भी जगह देने की कोशिश गलत नहीं होती, इससे अमेरिका को लाभ ही होगा। चीन नहीं चाहता कि उसे अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध में घसीटा जाए, मगर वह डरा हुआ नहीं है, यदि उसे मजबूर किया जाएगा, तो वह अपने हितों की रक्षा करेगा।

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  • Web Title:Hindustan Foreign Media Column May 15