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पिघलती बर्फ

यह निष्कर्ष पहले ही निकाला जा चुका है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय पर ग्लेशियर का पिघलना तेज हो रहा है, जिसके हिमालय के नीचे रहने वाली आबादी की आजीविका पर घातक परिणाम होंगे। एवरेस्ट क्षेत्र में 5,200 मीटर की ऊंचाई पर खुंबू ग्लेशियर पर वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है। अध्ययन के अनुसार, इस ग्लेशियर के आधे से ज्यादा इलाके (56 प्रतिशत) पर फैली बर्फ का जो तापमान है, वह वहां की हवा के तापमान से कम है। यह शोध या एवरड्रिल (2016-2019) ब्रिटेन और नेपाल के विश्वविद्यालयों और हिमालयन रिसर्च सेंटर ने मिलकर किया है।

रिसर्च टीम ने गरम पानी की धार के जरिए इस ग्लेशियर में 190 मीटर गहरे छेद करके उसमें तापमान सेंसर स्थापित किया। फिर महीनों तक तापमान का डाटा जुटाकर अध्ययन किया। बर्फ के तापमान का अध्ययन करके एक अनुमान यह भी लगाया गया कि भविष्य में जब पर्यावरण तापमान बढ़ेगा, तब ग्लेशियर और तेजी से पिघलेंगे। ग्लेशियर पर तापमान का बढ़ना जारी रहेगा और यहां वर्षा अप्रत्याशित हो जाएगी। ग्लोबल वार्मिंग के साथ जब बर्फ पिघलेगी, तो कोई भी अनुमान लगा सकता है कि एवरेस्ट क्षेत्र और पूरे हिंदु-कुश क्षेत्र के लिए उसका क्या अर्थ होगा।

यहां प्रति दशक बर्फ का तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। इसका अर्थ है, बाढ़ और सूखे की समस्या आम हो जाएगी। खुंबू में बर्फ का गिरना बढ़ेगा और दूसरे पहाड़ी रास्ते भी पर्वतारोहियों के लिए खतरनाक होते जाएंगे। स्खलन की आशंका बढ़ेगी और बर्फ की झीलें बाढ़ को जन्म देंगी। बर्फ की झीलों के फटने की 16 घटनाओं को नेपाल विगत दशकों में देख चुका है। हिमालय के ग्लेशियर दुनिया की एक चौथाई आबादी को जल मुहैया कराते हैं। हमें सोचना होगा कि हम बचाव के लिए क्या कर सकते हैं। इधर, मानसून के लिए भी नेपाल को तैयार रहना चाहिए। बादलों का फटना, पहाड़ों पर भूस्खलन और मैदानों में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा। हर संभव माध्यम से लोगों को पहले ही सचेत करने की व्यवस्था जरूरी है। लोगों का जीवन बचाना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। 

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  • Web Title:Hindustan Foreign Media Column June 25