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क्या कहते हैं ये नतीजे

आज जब दुनिया के कई लोकतंत्र भय और कलंक की राजनीति से त्रस्त हैं, तब कुछ देशों के वोटरों का अपने फैसले से यह संकेत देना कि ‘अब बहुत हो गया’, एक ताजा झोंके की तरह है। इन देशों के मतदाताओं ने ऐसे उम्मीदवारों को चुना है, जो अपने विरोधी को दुश्मन की तरह नहीं देखते। बीते इतवार को तुर्की में हुआ राष्ट्रव्यापी निगम चुनाव इसका एक बढ़िया उदाहरण है। वहां के मतदाताओं ने राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगन की नफरत भरी और विभाजनकारी सियासत को खारिज कर दिया है।

एर्दोगन पिछले 16 वर्षों से तुर्की की सत्ता पर काबिज हैं। वहां के मतदाताओं ने देश के छह बडे़ निगमों में से पांच का नियंत्रण अब मुख्य विरोधी पार्टियों को सौंपा है। इन शहरों के मतदाता राष्ट्रपति एर्दोगन के इस रवैये से आजिज आ गए थे कि वह अक्सर अपने राजनीतिक विरोधियों पर या तो आतंकियों का खैरख्वाह होने का लेबल चिपका देते हैं, या फिर उन्हें मुसलमान विरोधी और पश्चिम का एजेंट ठहरा देते हैं। पिछले दिनों वायरल हुए वीडियो में एक महिला ने उनसे पूछा कि ‘आखिर एक ऐसे इंसान को तुर्की पर शासन क्यों करना चाहिए, जो अवाम के बीच भेदभाव करता हो?

क्या विरोधी पार्टियां हमेशा बुरी होती हैं, और आप हमेशा अच्छे?’ ध्रुवीकरण की बजाय शांतिपूर्ण राजनीति के प्रति तुर्की के लोगों की चाहत राजधानी के विजयी मेयर प्रत्याशी के लफ्जों में देखने को मिली। रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के विजयी उम्मीदवार मंसूर यावास ने अपने समर्थकों से कहा, ‘कोई हारा नहीं है, अंकारा जीत गया है।’ तुर्की की सियासत का यह नया मिजाज देश के औद्योगिक नगर इस्तांबुल के मेयर चुनाव में और बेहतर दिखा, जहां रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के विजयी उम्मीदवार ने तुर्कों से अपील की कि ‘आपने एक भी शख्स को अगर अपनी बातों से दुखी किया, तो मुझे ठेस लगेगी।... जो घाव अब तक कुरेदे जाते रहे हैं, हमें उनको भरना है।’ 

मतदाताओं की यही समझदारी स्लोवाकिया में देखने को मिली है, जहां मेल-मिलाप और भाईचारे की पैरोकार जुजाना कैप्यूटोवा को देश का नया मुखिया चुना गया है। साफ है, तुर्की और स्लोवाकिया ने नफरत की राजनीति को नकार दिया है।

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  • Web Title:Hindustan Foreign Media Column April 5