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कनाडा में कट्टरपंथ

बेशक कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और उनके सलाहकार मतदाताओं के विभिन्न वर्गों को लुभाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे, लेकिन एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, लिबरल्स की स्थिति ठीक नहीं है। कंजर्वेटिव 42 प्रतिशत वोटों के साथ जीत जाएंगे और लिबरल्स को 29 प्रतिशत वोट ही मिलेंगे। एनडीपी तीसरे स्थान पर रहेगी। लिबरल पार्टी के सदस्य व प्रधानमंत्री ट्रूडो सत्ता में बने रहना चाहते हैं, यह बात समझ में आती है, सब राजनेता ऐसा ही चाहते हैं। हालांकि कुछ सीमा रेखाएं हैं, वोटों के लालच में उनको लांघना नहीं चाहिए। लगता है, ट्रूडो एक ऐसी रेखा लांघ गए हैं। कनाडा में आतंकवाद और कट्टरपंथ के संदर्भ में जन सुरक्षा संबंधी एक ताजा रिपोर्ट ने सिख कट्टरपंथ को सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का एक कारण माना है। एजेंसियां इन पर नजर रख रही हैं। इस बात से सिख समुदाय में नाराजगी है। हालांकि यह भ्रामक है।

रिपोर्ट स्पष्ट रूप से कट्टरपंथियों की बात कर रही थी, जैसे कि वह 1985 में एयर इंडिया बम विस्फोट की साजिश रचने वालों और उसके समर्थकों की ओर संकेत कर रही थी। रिपोर्ट सभी सिखों की भत्र्सना नहीं कर रही थी। फिर भी सिखों को समझाने की बजाय रिपोर्ट में बदलाव का फैसला किया गया। रिपोर्ट में से सिख कट्टरपंथ शब्द हटा दिया गया, उसकी जगह मात्र कट्टरपंथी शब्द का इस्तेमाल हुआ। यह बदलाव करने के बाद ट्रूडो ब्रिटिश कोलंबिया के गुरुद्वारों में धूम रहे थे और शोभा यात्रा में भाग ले रहे थे। यह मुश्किल बढ़ाने वाली बात है।

कनाटा की इंटेलिजेंस एजेंसी ने सोच-विचारकर इस शब्द का इस्तेमाल किया था। एक वोट संपन्न आयोजन में ट्रूडो को बुलाया नहीं गया, तो रिपोर्ट बदल दी गई। उग्रवाद विरोधी प्रमुख नेता उज्ज्वल दोसांझ ने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मसले को राजनीतिक लॉबिंग की चपेट में नहीं आने देना चाहिए, लेकिन वह ऐसा ही कर रहे हैं। ट्रूडो ने कनाडा की खुफिया एजेेंसियों को धता बताते हुए खालिस्तानियों के सामने हथियार डाल दिए। बस थोड़े से लोग विरोध कर रहे हैं, जिन्हें पूरे सिख समाज की आवाज नहीं माना जा सकता। काश! ट्रूडो ने इस बात पर गौर किया होता।

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  • Web Title:Hindustan Foreign Media Column April 17