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23 अक्तूबर, 2020|2:33|IST

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एक हॉरर शो

कोरोना महामारी, आर्थिक संकट और नस्लीय तनाव के इस माहौल में अमेरिकी मतदाता राष्ट्र की समस्याओं और उनके समाधान जानने के हकदार थे। पर बदले में वे एक ऐसे अराजक उत्सव के गवाह बने, जो दर्शकों को बेवकूफ बनाने वाली फिल्म सरीखा था। क्लीवलैंड में मंगलवार रात हुई बहस की शुरुआत में ही यह स्पष्ट था कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों की मंशा क्या है? डेमोक्रेट जो बिडेन का काम खुद को डोनाल्ड ट्रंप के विकल्प के रूप में पेश करना था। बिडेन अपने सियासी करियर में इसी तरह रहे भी हैं; स्वीकार्य, लेकिन असाधारण नहीं; न ज्यादा सख्त, न बहुत नरम; न ज्यादा उदार, न बहुत रूढ़िवादी। 77 साल की उम्र में उन्हें यह बताना था कि वह न ज्यादा बुजुर्ग हैं, न अतिउदारवाद के वाहक। वहीं, ट्रंप के लिए लक्ष्य थोड़ा मुश्किल था और उनकी प्रकृति के बिल्कुल विपरीत भी। उनके पास न केवल अपने वोट बैंक को मजबूत करने का मौका था, बल्कि दूसरे कार्यकाल का एजेंडा पेश करते हुए उन मतदाताओं को भी साधना था, जिन्होंने अब तक अपना मत तय नहीं किया है। बहरहाल, बिडेन बहुत बेहतरीन नहीं थे। वह बोलते-बोलते लड़खड़ा जाते और फिर अगल-बगल से अपनी बातें शुरू करते। उन्होंने इस सवाल को भी टाल दिया कि दिवंगत न्यायमूर्ति रूथ बदर गिंसबर्ग के उत्तराधिकारी के चयन के बहाने क्या वह रिपब्लिकन के खिलाफ बदले की कार्रवाई करेंगे? पर्यावरण की अपनी योजना को भी वह ठीक से जाहिर नहीं कर पाए। फिर भी, उन्होंने यह जरूर बताया कि कैसे स्वास्थ्य बीमा में संतुलन बनाया जाएगा और कैसे कोविड-19 की शिकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जाएगा? मगर ट्रंप के लिए यह किसी हॉरर शो से कम नहीं था। वह यह सोचकर क्लीवलैंड आए थे कि उनका काम सिर्फ बिडेन को निशाने पर लेना है। उन्होंने न सिर्फ गलत आंकड़े पेश किए, बल्कि दिल खोलकर झूठ बोले। कुल मिलाकर, यह ऐसी बहस नहीं थी, जिसके बाद ट्रंप सर्वेक्षणों में आगे चल रहे बिडेन को पकड़ सकें। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि यह वैसी चर्चा नहीं थी, जो अमेरिका को उसके लोकतंत्र की बेहतरी का आश्वासन देती हो।
 

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  • Web Title:hindustan foreign media column 2 october 2020