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लोकतंत्र का निरादर

साल 2015 में नए संविधान को अंगीकार किए जाने के बाद संसद ने अपनी दैनिक कार्यवाहियों के संचालन के लिए कुछ नियम बनाए थे। पूर्व के नियमों के विपरीत नई संसद ने एक प्रावधान किया है, जिसमें प्रधानमंत्री और मंत्रियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उन्हें संसद के दोनों सदनों में सदस्यों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब देने होंगे। इस प्रावधान को नियमों का हिस्सा इसलिए बनाया गया, ताकि मंत्री राष्ट्रहित के मुद्दों पर संसद के प्रति उत्तरदायी बन पाएं। संविधान भी यही कहता है कि मंत्रि-परिषद संसद के प्रति जवाबदेह है। यह निम्न सदन के स्पीकर और उच्च सदन के सभापति का कर्तव्य है कि वे प्रधानमंत्री और संबंधित मंत्रियों को सवालों के जवाब तैयार करने के लिए उन्हें मुनासिब वक्त दें।

लेकिन 29 अप्रैल से आहूत बजट सत्र में उद्योग, वाणिज्य और आपूर्ति मंत्री मैत्रिका यादव को छोड़कर किसी भी मंत्री ने दोनों सदनों में पूछे गए सवालों के जवाब नहीं दिए। बीते तीन महीनों में निचले सदन की 41 बैठकें हो चुकी हैं और संसदीय सचिवालय के मुताबिक, दोनों सदनों के सांसदों ने कम से कम 178 सवाल सरकार से पूछे हैं। इनमें कुछ सवाल प्रधानमंत्री से और शेष विभिन्न विभागों के मंत्रियों से संबंधित हैं, मगर न तो प्रधानमंत्री ने और यादव को छोड़कर न ही किसी अन्य मंत्री ने इन प्रश्नों के जवाब देने की जहमत उठाई।

संसदीय सचिवालय प्रश्नोत्तर काल में मंत्रियों की भागीदारी का साप्ताहिक कैलेंडर सार्वजनिक रूप से जारी करता है। प्रधानमंत्री के जवाब के लिए इतवार का दिन मुकर्रर किया गया है, पर उन्होंने कभी प्रश्नोत्तर काल में हिस्सा नहीं लिया। ऐसा कोई ठोस नियम नहीं है कि मंत्री को सभी प्रश्नों के उत्तर देने पड़ेंगे। वे प्रासंगिक सवाल चुन सकते हैं। लेकिन यह स्पीकर और सभापति का दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि संबंधित मंत्री सदन में मौजूद हों और सदस्यों के प्रश्नों के जवाब दें। प्रश्नोत्तर काल संसद को जीवंत बनाता है और जनता को भी पता चलता है कि सरकार में चल क्या रहा है। पूर्व स्पीकर ने ठीक ही कहा है कि सवालों से कतराना ‘लोकतंत्र का निरादर’ करना है।

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  • Web Title:Hindustan Foreign Media 14th August