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गरीबी के बावजूद

जिस दौर में विदेशी कर्ज तेजी से ऊपर जा रहा है और विकास के व्यय में कटौती की जा रही है, तब मात्र नौकरशाही की लालफीताशाही की वजह से विश्व बैंक के 2.3 अरब डॉलर का पाकिस्तान को आवंटन रुक जाना हास्यास्पद है। इस देरी की वजह बहुत छोटी है। वह खाता ही नहीं खोला जा सका, जिसमें राशि जमा होनी थी। इसके अलावा, राशि प्राप्ति के असंगत दिशा-निर्देश और नियुक्तियों को लेकर भी समस्या है। जिन परियोजनाओं के लिए राशि मिलनी थी, उनके संबंधित अधिकारियों की नियुक्ति तक नहीं की गई। संघीय सरकार और प्रांतीय सरकारों की कम से कम 27 विकास परियोजनाओं पर इसका असर पड़ा, क्योंकि उनके लिए राशि आवंटित न हो सकी। इसी दौर में, सरकार ने विभिन्न विदेशी स्रोतों से छह अरब डॉलर कर्ज लिए और वित्तीय घाटे को संभालने के लिए विकास परियोजनाओं में कटौती की।

पाकिस्तान ने विश्व बैंक से पहले ही बहुत ज्यादा कर्ज ले रखा है। विश्व बैंक से पाकिस्तानी नौकरशाही बडे़ पैमाने पर कर्ज लेने के कार्य में ही लगी रहती है, इसलिए उसके लिए ज्यादा कर्ज लेना कोई असंभव कार्य नहीं रहा है। यदि वाकई सरकार के पास विकास कार्यों के लिए पैसे नहीं थे, यदि सरकार के पास वाकई संसाधनों की कमी थी, तो यह उम्मीद करना तार्किक है कि अधिकारियों को विश्व बैंक से 2.3 अरब डॉलर के कर्ज लेने पर अपना ध्यान केंद्रित रखना चाहिए था। यदि अधिकारी सजग रहते, तो विश्व बैंक से राशि जारी होती और विकास कार्यों को रोकना न पड़ता। हमारे आर्थिक प्रबंधक सहयोगी देशों से कर्ज लेकर अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते रहे। अब इस ढर्रे को बदलना होगा।

आर्थिक टीम, जिसका नेतृत्व वित्त मंत्री के हाथों में है, वर्तमान स्थितियों को संभाले। यह काम नौकरशाही को सक्रिय करके या निजी लॉबी के जरिये या किसी अन्य माध्यम से पूरा किया जाए। देश के वित्तीय नेतृत्व को अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। नेतृत्व को ऐसी प्राथमिक विफलता तभी झेलनी पड़ती है, जब वह हवाई हो जाता है और सच्चाई को अपनी आंखों से देखने में नाकाम हो जाता है।

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  • Web Title:Foreign Media Hindustan Column 14th March