Earth Day: understand this danger - इस खतरे को समझें DA Image

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इस खतरे को समझें

विश्व के तमाम शहरों में चंद रोज पहले पृथ्वी दिवस पर बड़े-बडे़ कार्यक्रम हुए और जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने की बातें हुईं। यह व्यापक जन-भागीदारी से खड़ा ऐसा आंदोलन था, जिसकी हर तरफ चर्चा हुई, पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यही कहते दिखे कि उनके लिए अमेरिका के वित्तीय हित के आगे कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण संस्था का बजट लगभग खत्म ही कर दिया है। यह सब अमेरिका द्वारा खुद को 2015 के जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहासिक पेरिस समझौते से बाहर कर लेने की खबरों के बीच हुआ। श्रीलंका के लिए पृथ्वी दिवस उस वक्त आया, जब यह कचरे के विशाल ढेर से उपजी तबाही से जूझ रहा था, जिसमें 30 से ज्यादा लोग मारे गए। हालांकि सरकार ने इसके बाद तमाम उपाय किए हैं, जापानी विशेषज्ञों की भी मदद ली है। लेकिन यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है। समाज के हर वर्ग, धार्मिक समूह, और संगठन को इसके लिए जुटना होगा। पॉलीथिन व प्लास्टिक के खतरे समझने होंगे। जानना होगा कि आर्कटिक महासागर की सतह पर तैरते प्लास्टिक के 300 अरब टुकड़े किस तरह ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रहे हैं। भूलना नहीं चाहिए कि पांच दशक पूर्व अमेरिका में मनाए गए पहले पृथ्वी दिवस को आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत कहा गया था। तब से तमाम देश इस पर काम कर रहे हैं। पूरा विश्व पेरिस समझौते का भी सम्मान करता है, लेकिन ट्रंप इस मामले में अलग सोचते हैं। सच है कि अमेरिका का इससे हटना इसकी भावना के लिए घातक होगा। इसलिए जरूरी है कि पूरा विश्व इस मामले में एक हो। ऐसे मामले ट्रंप जैसे नेताओं के रहमोकरम पर तो छोड़े नहीं जा सकते। इनका कोई भरोसा नहीं कि ये कब क्या कहें, और क्या करें। देखना चाहिए कि पोप फ्रांसिस ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को चर्च और विश्व के लिए पहली प्राथमिकता माना है। भरोसा है कि अन्य धर्मगुरु भी इस मामले में साथ आएंगे। इस खतरे से लड़ना सबका पहला धर्म है व कर्तव्य भी। समस्या हमारी ही पैदा की हुई है, निदान भी हमें ही निकालना होगा। धरती के बढ़ते ताप को सिर्फ कोसने से काम नहीं चलने वाला।
द डेली मिरर, कोलंबो
 

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  • Web Title:Earth Day: understand this danger