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बेतुका है अमेरिकी प्रलाप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेश सचिव माइक पोम्पेयो की उत्तर कोरिया यात्रा इस तर्क के साथ रद्द कर दी कि उधर से परमाणु हथियार मामले पर प्रगति संतोषजनक नहीं है। अपने ट्विटर अकाउंट पर ट्रंप ने यह भी कहा, ‘इसके अलावा व्यापार पर हमारे सख्त रुख के कारण मुझे लगता है कि चीन भी इस मामले में वैसी मदद नहीं कर रहा है, जैसा कभी दिखाता था।’ अमेरिका अब दोषारोपण पर उतर आया है, जबकि उत्तर कोरिया से बातचीत में आए किसी भी गतिरोध की मुख्य जिम्मेदारी वाशिंगटन को लेनी चाहिए। जून में ट्रंप और किम जोंग-उन की बैठक के बाद प्योंगयांग ने अपने परमाणु परीक्षण स्थल नष्ट करने, मिसाइल सुविधाएं खत्म करने और कोरियाई युद्ध के दौरान मारे गए अमेरिकी सैनिकों के अवशेष अमेरिका को सौंपने के प्रति गंभीरता दिखाई थी, लेकिन अमेरिका सकारात्मक तो नहीं ही रहा, उसने प्योंगयांग को धमकी देना जरूर जारी रखा। ऐसा लगता है कि व्हाइट हाउस को एक अच्छा बहाना मिल गया है। कोरियाई प्रायद्वीप में शांति के सवाल और व्यापार युद्ध पर चीनी सख्ती को जोड़कर व्हाइट हाउस न सिर्फ ट्रंप-किम शिखर बैठक के नतीजों पर अपनी मंशा जाहिर कर रहा है, बल्कि यह प्रमाण है कि अपनी व्यापार नीति की बढ़ती आलोचना से वह कितना बेचैन है। कुल मिलाकर, व्हाइट हाउस की मंशा साफ नहीं है। परमाणु मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए समय सारिणी जरूरी है, पर इसका नियंत्रण अमेरिका के हाथों में देना उचित नहीं। वाशिंगटन को इसमें प्योंगयांग की सुरक्षा मांगों का भी ध्यान रखना होगा। नहीं भूलना चाहिए कि प्रायद्वीप में जब भी बात सकारात्मक दिशा में बढ़ी है, उसे अमेरिकी मनमानी से झटका लगा है। इस बार वह चीन के कंधे पर बंदूक रखने की फिराक में है। चीन हमेशा से अमेरिका-उत्तर कोरिया बातचीत को आसान करता आया है। वाशिंगटन को समझना होगा कि अगर वह चीन के साथ व्यापार पर अड़ियल रुख नहीं छोड़ता, तो चीन से भी उसे पहले जैसी उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ताजा अमेरिकी रवैया वैश्विक नीतियों के प्रति उसकी दुविधा का एक और प्रमाण है, जिसे समझा जाना चाहिए। 

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  • Web Title:China Global Times article in Hindustan on 28 august