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ईवीएम को लेकर हड़बड़ी क्यों

अगला आम चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से कराने की चुनाव आयोग की योजना काफी हैरान करने वाली है, क्योंकि इसकी लॉजिस्टिकल चुनौतियों से निपटने के लिए अब वक्त ही नहीं है। फिर अभी इस बात पर अंतिम फैसला होना बाकी है कि ईवीएम का इस्तेमाल आम चुनाव में होगा भी या नहीं, मगर इसके पहले ही 1.5 लाख मशीनों और अन्य जरूरी उपकरणों की खरीदारी के लिए 3,515 करोड़ टका आवंटित भी कर दिया गया है। ऐसे में, कई तरह के सवालों का उठना लाजिमी है। सबसे पहले तो इस कदम के वक्त को लेकर ही प्रश्न खड़ा हो जाता है। आखिर अभी क्यों? आम चुनाव में अब महज चार महीने बचे हैं, ऐसे में एक तिहाई निर्वाचन क्षेत्रों में बिल्कुल नई मतदान प्रणाली का इस्तेमाल व्यावहारिक प्रस्ताव तो कतई नहीं है। तब तो और, जब करीब तीन करोड़ वोटरों को इस कवायद से गुजरना होगा। दूसरी बात, रेगुलेट करने के पहलू को एक तरफ रख भी दें, क्योंकि इस समस्या को तो त्वरित मुस्तैदी से निपटाया भी जा सकता है, तब भी इस अहम पहलू को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है कि हमारे मतदाता अभी इस प्रणाली से वाकिफ ही नहीं हैं। इन तीन करोड़ लोगों में से ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अभ्यस्त नहीं हैं। ईवीएम के प्रति मतदाताओं में जागरूकता पैदा करने और इस प्रणाली में उनका भरोसा कायम करने के लिए आखिर इतने कम वक्त में कितने प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा सकेंगे? यहां तक कि हिन्दुस्तान में भी कई दशकों की आजमाइश के बाद ही ईवीएम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हुआ। फिर हमारे यहां उसी तरह की कवायद क्यों नहीं हुई?  

बांग्लादेश में सियासी पार्टियों के बीच अभी जैसा अविश्वास कायम है, उसे देखते हुए यह भी जोखिम है कि नई प्रणाली की शुरुआत चुनाव व्यवस्था में मतदाताओं के भरोसे को कहीं और डिगा न दे। हालांकि हम वोटिंग तंत्र के डिजिटलाइजेशन के हक में हैं, मगर हमें यह महसूस होता है कि इतने कम वक्त में यह योजना लागू करने योग्य नहीं है।

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  • Web Title:Bangladesh The Daily Star article in Hindustan on 31 august