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सच्चाई को कैद नहीं कर सकते

म्यांमार ने रायटर्स  के दो पत्रकारों को जेल भेजने में जैसी तेजी दिखाई, वह अकल्पनीय है। मीडिया पर ऐसे निर्मम हमले को न्याय की चाशनी में डुबोकर जिस तरह पेश किया गया, उसके बाद तो कभी दुनिया की आंखों का तारा रही सरकार की मुखिया आंग सान सू की सहित पूरी सत्ता को ही इस्तीफा दे देना चाहिए। दोनों युवा पत्रकार एक साल पहले सेना द्वारा रोहिंग्या लोगों को देश से निकालने के अभियान में किए गए नरसंहार की रिपोर्टिंग कर रहे थे। रोहिंग्या लोगों पर अत्याचार को संयुक्त राष्ट्र के ‘फैक्ट फाइंडिंग मिशन’ ने भी पिछले हफ्ते ‘अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जघन्यतम अपराध’ माना है। दोनों पत्रकारों ने 17 से 45 वर्ष की उम्र के दस रोहिंग्या लोगों की सनसनीखेज हत्या पर गहराई और अत्यंत बारीक ब्योरों के साथ रिपोर्टिंग की थी। सरकार ने इस रिपोर्ट से तो इनकार नहीं किया, एक तानाशाह की तरह उन रिपोर्टरों को ही जेल भेजने का इंतजाम कर दिया। पुलिस ने कुछ जानकारी साझा करने के बहाने उन्हें बुलाया और कुछ कागज दिए। इससे पहले कि रिपोर्टर देख पाते कि उन कागजों में क्या है, उन्हें उस ब्रिटिश औपनिवेशिक गोपनीयता कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया, जो किसी को ऐसे दस्तावेज रखने या प्रकाशित करने से रोकता है, जो दुश्मन के लिए उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि मुकदमे के दौरान एक साहसी पुलिसवाले की गवाही ने खेल बिगाड़ दिया, जिसने बताया कि किस तरह वरिष्ठ अफसरों ने ऐसा केस फ्रेम करने को कहा था कि इन्हें जेल भेजा जा सके। इस मसले में जैसी त्वरित वैश्विक प्रतिक्रिया हुई, वह महत्वपूर्ण है। म्यांमार पर बढ़ता दबाव बता रहा है कि सू की इस वक्त वही सब कर रही हैं, जिसकी कभी वह मुखर विरोधी थीं। त्रासदी ही है कि म्यांमार का सैन्य व नागरिक शासन समझ नहीं रहा कि वे म्यांमार की उम्मीदों को ध्वस्त कर रहे हैं। दुर्भाग्य है, यह सब उन सू की को नहीं दिख रहा, जिनकी लोकतांत्रिक लड़ाई में यही मीडिया मजबूत दोस्त बनकर खड़ा रहा। वह भूल गई हैं कि पत्रकार भले कैद कर लिए जाएं, सच्चाई नहीं कैद की जा सकती।

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  • Web Title:America New York Times article in Hindustan on 08 september