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हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से

sudhish pachauri

कितना अद्भुत कवर है, हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से आपको अशेष शुभकामनाएं।/ आपके नए संकलन की खबर सुनी, हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से शुभकामनाएं।/ कहां से छपा है? देखने का मन कर रहा है। बहरहाल, हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से आपको अशेष शुभकामनाएं।/ बहुत दिन हुए आपसे मिलना न हुआ। दिल्ली आ रहा हूं। हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से आपको अशेष शुभकामनाएं।/ आप कितना अच्छा लिखते हैं। आपकी उंगलियों को चूमने का मन करता है। हृदय की तलस्पर्शी...।/ असहमत होने के लिए मुझे माफ करें। मुझे लगता है आपमें हमें नया प्रेमचंद मिल गया है। हृदय की तलस्पर्शी...।

आप ने अपनी टिप्पणी में इन उनका नाम तो लिया, लेकिन मेरा शायद भूल गए। कोई बात नहीं, आपकी यह भूल याद रहेगी।

अरे भाई, भूल गया होऊंगा। भूलने को क्या मेरा ही नाम बचा था? मैं तो आपको बिना किसी गुट वाला आजाद ख्याल मानता था। अब साफ हुआ कि आप भी गुटबाजी करते हैं। कितने अफसोस की बात है कि एक जाना-माना वरिष्ठ लेखक टुच्ची किस्म की गुटबाजी में संलिप्त है। गुटबाजी तो राजेंद्र यादव करते थे। आप चुन लें कि आप राजेंद्र यादव बनना चाहते हैं या मुक्तिबोध? आप जरा सी बात का बतंगड़ बना रहे हो। भूल हो गई। क्या मुझे भूलने का हक भी नहीं।

नहीं, आप में साहस नहीं कि मेरा नाम लेते। मेरा नाम लेते, तो ये-ये-ये सब नाराज हो जाते। आप अपने इन मित्रों को कैसे नाराज करते? मैं ही बचा था, जिसे नाराज किया जा सकता था, क्योंकि मेरे पीछे कोई गुट नहीं है। कोई बात नहीं। अब मैं आपको 'अमित्र' करता हूं।

मित्र ने अमित्र कर दिया। बहुत दिनों तक मित्र 'अमित्र' रहा, फिर एक दिन मित्र ने अमित्र को फिर से मित्र 'कर' लिया। इस बार मित्र ने लिखा- आपको यह सम्मान मिलने के लिए बधाई। यूं इस बीच मुझे भी ऐसा ही एक सम्मान मिला है। बहुत अच्छी खबर है। मेरी शुभकामनाएं। भविष्य में आप और बड़े सम्मान प्राप्त करें।  

साइबर जगत में साहित्य इसी तरह 'होता' है। पहले मित्र बनते-बनाते हैं, फिर जरा सी बात पर अमित्र कर देते हैं। फिर कुछ दिनों बाद जिसे अमित्र किया था, उसे फिर से 'मित्र' कर लेते हैं। जिस तरह से राजनीति में कोई परमानेंट मित्र या शत्रु नहीं होता, उसी तरह इन दिनों के साहित्य में भी न कोई परमानेंट मित्र होता है, न शत्रु। यहां दो ही प्रकार के संबंध हैं- मित्र संबंध या अमित्र संबंध। इन दिनों का साइबर साहित्यकार 'अजातशत्रु' टाइप है। यहां या तो 'मित्र' होते हैं या फिर 'अमित्र'। यहां कोई किसी का दुश्मन नहीं होता। अमित्र मात्र 'अमित्र' होता है, 'शत्रु' नहीं होता। 'शत्रु' विचारधारात्मक केटेगरी है। शत्रु खुंदकी होता है। बदला लेता है। हर हालत में दुश्मनी निभाता है, जबकि अमित्र का मतलब है 'उपेक्षणीय'। 'उपेक्षित' को फिर से 'अपेक्षित' किया जा सकता है, किंतु 'शत्रु' को आसानी से 'मित्र' नहीं बनाया जा सकता।

'मित्र-अमित्र' संबंध के तीन चरण हैं- पहला, 'हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से अशेष शुभकामनाएं' वाला चरण। दूसरा, जरा सी बात पर रूठकर मित्र को ‘अमित्र’ करने का 'रूठ मटक्के' वाला चरण। तीसरा है, कुछ दिनों के बाद ‘अमित्र’ को ‘मित्र’ करने का चरण। साइबर साहित्य में यही तीन चरण दुहरते रहते हैं। यहां लेखक एक पल में चमचा और अगले पल में करछुल होता है। यही है साइबर लेखक की 'हृदय की तलस्पर्शी गहराइयों से' का मर्म।

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  • Web Title:tirchi nazar article of 1st september