DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बधाई हो बधाई, पुरस्कार की बधाई

सुधीर पचौरी

जब भी किसी को कुछ मिलता है, तो अंदर से मेरा मन भले कुढ़े, ऊपर से बधाई देना नहीं भूलता। तुरंत फोन लगाता हूं। फोन नहीं उठता, तो तुरत मैसेज करता हूं- मुबारक हो सरजी। सारा खेल ‘टाइमिंग’ का है। जरा सी देर हुई कि सब बेकार। देर हुई कि आपकी बधाई बासी। इधर उनको कुछ मिला और उधर आपने कहा- सरजी, बधाई हो। ऐसा लग रहा है, जैसे मुझे ही मिला है। मेरी कामना है कि एक दिन आपको पद्म भी मिले और ज्ञानपीठ भी।
बधाई देना एक कला है। जिसने यह साध ली, उसने साहित्य का वर्तमान और भविष्य, सब साध लिया। नियम है कि बधाई दोगे, तो बधाई मिलेगी। बधाई कभी बेकार नहीं जाती। बधाई वह चीज है, जिसे देने में आपका कुछ जाता नहीं और जिसे दी जाती है, उसे उसके अलावा कुछ और भाता नहीं।
बधाई देते ही मुझे कुछ-कुछ होने लगता है। अंदर ही अंदर ‘फील गुड फैक्टर’ टाइप। अपना साहित्यिक भविष्य उजला-उजला सा दिखने लगता है। मन हर्षित, तन पुलकित हो जाता है। मन में निराली उमंग भर जाती है। उत्साह से ‘बधाई योग्य’ लिखने का प्रण करने लगता हूं और ज्ञानपीठ की तरफ चातक की तरह देखने लगता हूं। ‘सच्चा आनंद देने में है’ -इस महावाक्य का मर्म समझ में आने लगता है। मन ही मन मैं अपने को, राजा बलि और कर्ण जैसे दानवीरों की लाइन में लगा देखने लगता हूं।
सब ‘बधाई’ की लीला। बधाई के नित्य जादू को देख मैंने तो एक पूरा ‘बधाई शास्त्र’ ही विकसित कर लिया है। मिलने पर तो सब बधाई देते हैं। मैं तो एडवांस में ही बधाई देने लगता हूं। सुबह-सुबह फोन लेकर बैठ जाता हूं और अपने इष्टों की कुशल-क्षेम पूछने लगता हूं- कैसे हैं? क्या लिख रहे हैं? कहां बोलने जा रहे हैं? अच्छा उस दिन आपने वहां जो बोला, उसकी दूर-दूर तक चर्चा है। आपका लोहा सब मानते हैं। बंदा मस्त। किसी से पूछता हूं- बहुत बिजी हैं? कौन सी किताब आ रही है? पटना में लोग आपके भाषण की बड़ी तारीफ कर रहे थे... बंदा सातवें आसमान पर। किसी से कहता हूं- आपकी वो वाली किताब पढ़ी। अंग्रेजी में होती, तो सच कहता हूं, आपको नोबेल मिलता। बुकर तो कहीं गया नहीं था... बंदा खुश।
बधाई-दान की महिमा जानने के बाद तो मैंने ‘बधाई’ का साधारणीकरण ही कर दिया है, क्योंकि ‘न जाने किस भेष में बाबा मिल जाएं भगवान रे।’ जो भी सामने पड़ता है, उसे ही बधाई देता चलता हूं और उसके जादू को देखता रहता हूं। बधाई पाकर मरगिल्ला चेहरा भी चमकने लगता है। चाल में फुर्ती आ जाती है। किसे पड़ी है कि पूछे कि ये बधाई क्यों दे रहे हो? मेरे जीवन का तो मूलमंत्र है- ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।/ औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय। 
जब से मैंने समकालीन साहित्य के स्थाई भावों, जैसे ईष्र्या, द्वेष, स्पद्र्धा, मान, अमर्ष और आजकल वाले ‘आई-मी-माईसेल्फ’ को किनारे किया है, तब से ही मेरा फ्यूचर मुझे कुछ भव्य-भव्य सा दिखने लगा है। सच्ची बात है- ‘गुडविश’ करने से ही ‘गुडविल’ बढ़ती है। फ्री की बधाई, फ्री में पठाई। दान के बारे में संतजनों ने कहा भी है- मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर/ तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर?
यानी ‘हर्रा लगे न फिटकरी, और रंग चोखा ही आए’ आज एक बधाई देता हूं, तो कल मुझे डबल मिलेगी। आप भी दें, तो आपको भी मिलेगी। बधाई हो   फिल्म ने दो सौ करोड़ रुपये यूं ही नहीं कमा डाले। आखिरकार बधाई का जादू ही ऐसा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 9 december