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मेरा हनुमान चालीसा

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

देवदत्त पटनायक ने अंग्रेजी में लिखी मेरी हनुमान चालीसा  देखते-देखते हिट हो गई। फिर हिंदी में आई, और क्या बात कि यह भी हिट हो गई। मैं अंदर ही अंदर ईष्र्या के मारे जल-भुन रहा हूं। लेखक का काम ही जलना है। इधर मैं उनकी चालीसा देख जल रहा हूं, उधर वह किताब में छपे पर हंसे जा रहे हैं। उनके पास उनके बजरंगी भाईजान हैं, मेरे पास होते हुए भी नहीं है, क्योंकि र्मैं ंहदी वाला हूं।
अंग्रेजी है ही ऐसी पुण्यात्मा भाषा। उसमें लिखो, तो सेकुलर हो जाते हो, हिंदी में लिखते ही कम्यूूनल कहलाते हो। इसीलिए मैं अंग्रेजी लेखकों के भाग्य से जलता हूं। अपने देवदत्त पटनायक को ही देख लो। धड़ल्ले से लिख मारा- मेरी हनुमान चालीसा।  हर लाइन में हिंदू धर्म की, उसके मिथकों-पुराणों की कहानियां कहते हैं। उनके हवाले से हनुमानजी की महिमा का बखान करते हैं, लेकिन मजाल कि कोई कह सके कि वह साहित्य में कम्यूनल कार्ड खेल रहे हैं। हिंदी में आप जरा हनुमानजी का नाम तो लेके देखो, फिर देखो आपकी पिछाई कैसे की जाती है, आपको कैसे ‘ट्रोल’ किया जाता है?
अंग्रेजी लेखक अमीष त्रिपाठी को ही ले लें। अमीष ने शिवजी को लेकर तिकड़ी लिख दी और सुपरहिट हो गए। लुटियनों से लेकर लिलिपुटियनों तक सर्वत्र उनके चर्चे रहे, लेकिन मजाल कि किसी ने उनको कम्यूनल कहने की हिम्मत की हो। हनुमान चालीसा  गीता प्रेस में छपे, तो कम्यूनल हो जाता है, और अंग्रेजी में छपे, तो सेकुलर हो जाता है। भाषा भाषा की बात है। हर भाषा की अपनी राजनीति होती है। वही उसका भाग्य तय करती है। 
अंग्रेजी सदा सुहागिन भाषा है और हिंदी को देखकर हमेशा अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी की लाइनें याद आने लगती हैं। नरेंद्र कोहली ने हिंदी में रामकथा लिखी और जबर्दस्त हिट हुई। आज भी सुपरहिट है। सबसे अधिक बिकती है। लेकिन हिंदी के आलोचकों को वह फूटी आंख न सुहाई। उनकी कथा किसी ने न पढ़ी, फिर भी राम का नाम लेने मात्र से हिंदूवादी लेखक करार दिए गए। 
एक बार अज्ञेयजी ने ‘जय जानकी जीवन’ यात्रा कर डाली। कुछ लेखक भी उनके संग गए, लेकिन अज्ञेय को सीधे ‘हिंदूवादी’ होने का अभिशाप झेलना पड़ा। इसी तरह हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा एक बार कुंभ मेले को विजिट कर आए, तब भी हिंदी वालों ने ऐसा ही चबैया किया। उनको सीधे हिंदूवादी बताया जाने लगा। इसीलिए कहता हूं कि हिंदी स्वभाव से ही ‘प्रगतिशील’ है और इस कदर प्रगतिशील लाइन लेती है कि कोई जरा सा भी इधर-उधर होता है, तो उसे सीधे संघी बना देती है। संघियों को कुछ नहीं करना पड़ता। उनको तो हिंदी वाले फ्री में भेंट किए जाते हैं।
देवदत्त की हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं और एक नए हनुमान से परिचित होते हुए उनकी कलम से मन ही मन ईष्र्या किए जा रहा हूं कि काश मैं भी लिखता- मेरा हनुमान चालीसा। बचपन से पढ़ता आया। दिल्ली में प्रगतिशीलता की हवा लगी, तो किताबों के बीच छिपा दिया, लेकिन चालीसा भूला नहीं। कोई नहीं भूलता। जब-तब याद आ ही जाता और  लाल देह लाली लसे अरु धर लाल लंगूर  को याद कर कहता भी रहा कि हनुमानजी तो कामरेड थे, उनको भी लाल पसंद था। लेकिन इतना साहस नहीं हुआ कि चालीस लाइनें लिख पाता और देवदत्त पटनायक की लाइन में लग जाता।
सोचता हूं कि अब लिख ही डालूं मेरा हनुमान चालीसा। जिस तरह देवदत्त के दिन फिरे, हनुमान कृपा से अपने भी फिर जाएं।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 8 july