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10 अप्रैल, 2020|5:45|IST

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दो टके का लेखक

एक लेखक ने दूसरे के बारे में कहा- वह तो ‘दो टके’ का लेखक है। दूसरी तरफ से जवाबी जुमला आया- क्या वह खुद ‘चवन्नी छाप’ है? इस ‘साइबरी विमर्श’ को देखकर लगा कि और कुछ किया हो या न किया हो, हिंदी आलोचना ने अपने कुछ नए ‘प्रतिमान’ स्थापित किए हैं। 
‘टका’ मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में चलता था। अब वह सिर्फ बांग्लादेश में चलता है। अपने यहां या तो ‘रुपया’ चलता है या फिर ‘डॉलर’ चलता है। फिर भी, जब कोई किसी का ‘असली मूल्यांकन’ करने पर आता है, उसे ‘दो टके का’ या ‘चवन्नी छाप’ ही कहता है। ‘दो रुपये का’ या ‘पच्चीस पैसे छाप’ नहीं कहता। कारण कि जो मजा ‘टके’ की ‘टकार’ में है, वह ‘रुपे’ की ‘रूपंकरता’ में कहां? जब पड़ोसियों में स्पेस के लिए ‘वाक् युद्ध’ होता है, तो एक-दूसरे को ‘दो टके का’ कहने का ऐसा रचनात्मक इस्तेमाल होता है कि मामला कई बार अदालत जाकर ही दम लेता है।
मैं इसे हिंदी साहित्यालोचना का ‘नया प्रतिमान’ मानता हूं। संस्कृत में यह भरत, भामह, दंडी, उद्भट, रुद्रट, विश्वनाथ, जगन्नाथ, अभिनवगुप्त, आनंद वर्धन, मम्मट और राजशेखर तक पर भारी है। अंग्रेजी में यह प्लेटो, अरस्तू, लांजिन्स, जॉनसन , लीविस, रिचडर्स, ईलियट से लेकर लूकाचादि सब पर भारी है। और हिंदी में यह महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंद दुलारे वाजपेई, नगेंद्र, नामवर आदि सब पर भारी पड़ता है।
साहित्य के मूल्यांकन के चक्कर में इनमें से हर एक ने बड़े-बड़े पोथे लिखे, फिर उनकी टीकाएं। उनकी भी टीकाएं होती रहीं, लेकिन यह किसी ने न जाना कि बिना किसी लाग-लपेट के भी तुरत और दो-टूक तरीके से किसी ‘साहित्यकार’ का इस तरीके से भी ‘मूल्यांकन’ किया जा सकता है कि ये ‘दो टके का’ है, वो ‘चवन्नी छाप’ है। 
कितना सीधा, सुंदर, दो टूक और बेधड़क मूल्यांकन है कि जो करता है और जिसका किया जाता है, दोनों के संबंध तुरत ‘द्वंद्वात्मक’ हो उठते हैं। जैसे ही एक कहेगा कि ‘तू नक्काल है’ तो दूसरा कहेगा ‘तू परले सिरे का चोट्टा है। इस-उस की लाइनें मारकर ‘अपनी’ बनाता है।
यह सब अपने प्यारे-दुलारे सोशल मीडिया का साहित्यिक अवदान है, जिसमें अनंत लेखक-लेखिकाएं एक-दूसरे को ‘पल में अर्श पर, पल में फर्श पर’ पटकते रहते हैं। लंबी चौड़ी, बोर करने वाली सैद्धांतिक विवेचना से मुक्त एकदम दो-चार शब्दों में निपटान। इधर किसी ने किसी को गरियाया नहीं कि उधर से किसी ने लतियाया नहीं। एक कहता है कि ‘वह चोर है, इस-उसका माल मारकर साहित्यकार बना है’ तो तुरत जवाब आता है कि ‘तुम्हारी सात पुश्तों को जानता हूं, जुबान न खुलवाओ, वरना कहीं मुंह दिखाने लायक न रहोगे’। ‘अच्छा तू धमकी देता है? भूल गया कि जब उस लड़की से तू पिटने को था, तो किसने बचाया? अब शेर बन रहा है।’ सच कहूं कि ऐसे एक-एक वाक्य पर भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से लेकर मम्मट का काव्यप्रकाश तक कुर्बान।
कैसा ‘शब्द लाघव’ है? कैसी ‘अलंकार योजना’ है? कैसे ‘उपमा, रूपक उत्प्रेक्षाएं’ हैं? कैसी मौलिक ‘वक्रोक्तियां’ हैं, जिनको सुन-पढ़कर उर्दू के शायर ‘चिरकीन’ का शब्दकोश तक लज्जित हो उठे। सच कहूं, आलोचना ने अपनी सही जमीन अब जाकर पाई है। न रचना-प्रकिया पर बात, न किसी ‘महान उद्देश्य’ की खोज, न ही अर्थ-प्रक्रिया की ‘संरचनावादी’ या ‘विखंडनवादी पद्धति’ की जटिलता। सीधे ‘मित्र-शत्रु न्याय’। 

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 8 december