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मेरे हमदम, मेरे दुश्मन

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

कब से कहता आ रहा हूं कि साहित्य के नाम पर दिए जाने वाले सम्मानों-वम्मानों को बंद करो। सम्मान से होता क्या है? मुझे तो हर सम्मान अपना पर्सनल अपमान लगता है। इसीलिए कोई देता भी है, तो नहीं लेता। अब देखिए न। इस बार वे मुुझे देने जा रहे थे। मैंने कहा कि आपके रिजेक्टेड माल के लिए क्या मैं ही बचा हूं? ये है मेरी ‘सेल्फलेसनेस’। मेरे ‘स्वार्थ’ का विसर्जन। मेरे मानक कुछ सख्त हैं। कोई दे और ले लूं, ऐसा भिखमंगा मैं नहीं हूं। मैं इस बरस दिए जाने वाले साहित्य के नोबेल की बात कर रहा हूं।
कमेटी के चेयरमैन सर तो एक साल पहले रिजाइन कर गए थे। उधर न जाने कब से ‘ही टू-ही टू’ होता आ रहा था। जब एक ने ‘मी टू’ कर दिया, तो विश्व साहित्य के मानकों की सच्चाई ज्ञात हुई। सरजी दो साल के लिए अंदर हैं। आश्चर्य कि उनके कार्यकाल में जितनों को नोबेल मिला, वे सब चुप्पी साधे बैठे हैं।
यह तो मुझे बाद में ज्ञात हुआ कि किसी ने मेरा नाम नोबेल के लिए भेजकर मुझसे न जाने किस जन्म की दुश्मनी निकाली। ऐसे में मैं क्या करता? मैंने सोचा- महाजनो येन गत: सपंथा:। सो मैं भी ‘मौन’ धारण कर गया। जैसे कभी अज्ञेय ने नोबेल के लिए अपने नाम की अफवाह उड़ने पर धारण किया था और जिस तरह कन्नड़ के नामी कथाकार का नाम भी बताया गया था।
जब उनका फोन आया, तब मैंने मौन तोड़ा। कहने लगे कि इस बार आपको देते हुए हमें बड़ी खुशी हो रही है, आप ‘हां’ करने की कृपा करें। मैंने तो कह दिया- आप इतने खुश न हों। मेरी तरफ से कैपिटल लेटर वाला ‘एन ओ’, यानी ‘नो’ है। मैं हिंदी साध्य और साधन, दोनों की पवित्रता का कायल हूं। आपका साध्य तो ठीक है, क्योंकि यहां आपका ‘साध्य’ मैं हूं, लेकिन ‘साधन’ मेरे जितना पवित्र नहीं है।
यही हिंदी की तीसरी परंपरा है। हिंदी वाले अपने मान-सम्मान को लेकर हमेशा ही काफी संवेदनशील रहे हैं। छोटा हो या फिर बड़़ा, पांच हजार का हो या 25 हजार का, लाख का हो या 10-20 लाख का, किसी के लिए कोई कभी पैरवी नहीं करता। वैरागी ऐसे हैं कि जिस दिशा में अकादेमी या ज्ञानपीठ का दफ्तर है, उधर ताकते तक नहीं। ऐसे स्वाभिमानी हैं हिंदी वाले कि दुनिया के बड़े-बड़े स्वाभिमानी तक उनका पानी भरें। 
बुरा हो साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष का कि एक लेख लिखकर हिंदी की महानता की पोल खोल दी- बता दिया कि अकादेमी सम्मान के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते? सम्मान ‘प्रदान’ नहीं किए जाते, ‘झटके’ जाते हैं। प्लानिंग की जाती है। पैरवी की जाती है। विद्वता-फिद्वता किस खेत की मूली है? मैंने तो इसीलिए एडवांस में ही ‘नो’ कह दिया।
आप सोचते होंगे कि कैसी ऊंची फेंक रहा है? ऐसे तो कोई भी फेंक सकता है। नोबेल वाले क्या इसी दो टके छाप के लिए पलकें बिछाकर बैठे थे? अमेरिकी-यूरोपीय-लातीनी अफ्रीकी क्या मर गए? फिर बिना रिकमेंडेशन तो किसी का नाम नोबेल तक पहुंचता नहीं। उसकी भी बड़ी टेढ़ी प्रक्रिया है। तब साहित्य के इस घोषित बखेड़ेबाज का नाम किस मूर्ख ने प्रस्तावित कर दिया और किस अहमक ने रिकमेंड कर दिया?
अब मैं क्यों बताऊं कि किसने किया? बस इतना ही हिंट दूगा कि कि सब ‘ऊपर वाले’ ने किया। और ‘ऊपर वाले’ से आप पूछ लो। जब अज्ञेय का गया, तब क्या मैंने पूछा कि किसने भेजा? अब मेरा गया, तो जल मरे?
क्यों मेरे भाग्य से जलते हो मेरे जलोकड़ो।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 7 october