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अपने कॉडवेल, ब्रेख्त और बेंजामिन

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

एक बार फिर अपने लेखक अपने मोरचे पर हैं। दो सौ लेखकों ने अपने सिग्नेचर करके जनता को प्रबोधा है कि ‘हेट’ की राजनीति के खिलाफ वोट करें और बहुलतावादी ‘जनतंत्र’ और ‘आजादी’ को बचाएं। 
अपनी ‘सिग्नेचर ब्रिगेड’ के ऐसे जोशीले बयान देखकर मुझमें भी जोश भर गया है और मेरे कानों में एक से एक क्रांतिकारी गीत बजने लगे हैं- हम होंगे कामयाब एक दिन...। लगता है कि क्रांति होने ही वाली है। इस बार वे जनतंत्र और बहुलता की आजादी के लिए कमर कसे हैं। मैं लिस्ट के लेखकों के नाम पढ़ रहा हूं और  हैरान हुआ जा रहा हूं- अरे, ये ही तो हैं अपने देसी ‘क्रिस्टोफर कॉडवेल’, ‘बर्तोल्त ब्रेख्त’ और ‘वॉल्टर बेंजामिन’। ये ही तो हैं अपनी देसी सिमोन द बुआ जी, जर्मेन ग्रीअर जी और नाओमी वुल्फ जी। लिस्ट की शोभा बढ़ाने वाले कुछ ‘झोले’ और कुछ ‘लटकन’ भी हैं।
समूची लिस्ट देखने के बाद ही मैं आश्वस्त हुआ कि अब ‘जनतंत्र’ बचके रहेगा, ‘आजादी’ बनी रहेगी, ‘बहुलता’ बची रहेगी और ‘हेट’ की राजनीति खत्म होगी। एक साथ इतने नाम देख मुझे अपने इतिहास पर गर्व भी हुआ कि ऐसे बहादुर लेखक सिर्फ यूरोप में नहीं होते, अपने यहां भी होते हैं। यूरोप में तो मुश्किल से दस-पांच ही हो पाए, अपने यहां पूरे दो सौ के दो सौ हैं। कई मानी में तो अपने वाले बंदे यूरोप वाले ओरिजिनल कॉडवेल, ब्रेख्त और  बेंजामिन से मीलों आगे हैं। 
यकीन न हो, तो तुलनात्मक अध्ययन करके देख लें- एक ओर हैं इंग्लैंड वाले कॉडवेल, जो माक्र्सवादी चिंतक होने के साथ मशीनगन एक्सपर्ट भी रहे। बहुत से लेखकों के साथ वह भी ‘इंटरनेशल ब्रिगेड’ में शामिल हो गए और ‘स्पेनिश सिविल वार’ में जरामा घाटी के युद्ध में पहले दिन ही लड़ते हुए मारे गए। उधर ब्रेख्त ने वक्त रहते जर्मनी छोड़ दी और अमेरिका में पनाह ले ली। बेंजामिन स्पेन के रास्ते अमेरिका पहुंचना चाहते थे, पर गिरफ्तार हो गए और ‘गेस्टापो’ से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। इनके मुकाबले हैं हमारे ‘सिग्नेचर ब्रिगेड’ वाले देसी कॉडवेल, ब्रेख्त व बेंजामिन, जिन्होंने अपनी ‘सिग्नेचर लीला’ मात्र से बड़े से बड़े ‘वर्ग शत्रु’ के छक्के छुड़ा दिए। जनता में अलख जगा दी और वोट किधर देना है, यह भी बता दिया।
कहां वे और कहां ये। अपने वाले इन ‘चतुर सुजानों’ के मुकाबले पिछली सदी के यूरोप वाले  मूर्ख नजर आते हैं। ये यूरोप वाले अपने ‘सिग्नेचरों’ की ताकत समझ लेते और ‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’ की जगह ‘सिग्नेचर ब्रिगेड’ बनाना सीख लेते, तो जान तो न देनी पड़ती और कहीं भागना भी नहीं पड़ता। विद्रोही के विद्रोही, और तीनों लोक भी संवर जाते।
उनसे तो बेहतर हैं अपने ‘सिग्नेचर वीर’। ये न केवल अपने ‘सिग्नेचर’ की कीमत जानते हैं, बल्कि सिग्नेचरों को गोले की तरह चलाना जानते हैं और आनन-फानन में ‘सिग्नेचर ब्रिगेड’ खड़ी करने में एक्सपर्ट हैं। इनके सिग्नेचरों से बड़े-बड़े देवता डरते हैं। 
वे दर्जनों बार सत्ता से ‘सिग्नेचर संघर्ष’ कर चुके हैं, लेकिन मजा यह कि आज तक इनका एक ‘बाल’ भी ‘बांका’ नहीं हुआ, न कभी इनकी एक उंगली ही कटी। लड़ने का ‘नो रिस्क’ छाप पेंतरा सीखना हो, तो इन लिस्ट वालों से सीखें कि ‘हाउ टु हर्रा लगे न फिटकरी और रंग चोखा आए।’ टीवी और सोशल मीडिया पर हल्ला कराया, बड़ी खबर बनाई, नाम कमाया और इस तरह अपना भविष्य सुरक्षित कराया।
ऐसे ही अप्रतिम वीर हैं अपने ये कॉडवेल, ब्रेख्त और बेंजामिन।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 7 april