tirchi najar hindustan column on 5 january - एक गधे का साहित्य-विलाप DA Image
20 फरवरी, 2020|9:24|IST

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एक गधे का साहित्य-विलाप

बरस की टॉप की बीस रचनाएं। टॉप के पांच रचनाकार। बरस के बेस्ट सेलर। लिस्ट पर लिस्ट बन रही हैं। जिस लेखक का नाम आ जाता है, वह नाचने लगता है, जिसका नहीं आता, वह गीता  का ‘निष्काम कर्मयोगी’ बन जाता है।
‘लेकिन प्रभु! कहीं तो चर्चा होती। इतना लिख डाला, कोई पढ़ता नहीं। इतना बोला, इतने भाषण दिए, पर अब कोई सुनता ही नहीं। सभी प्राणी अपने-अपने मोबाइल में खोए रहते हैं। क्या करूं कि ‘बेस्ट सेलर’ वाली किसी लिस्ट में आ जाऊं?’ 
‘हे साहित्य के धनुर्धारी, तू ध्यान लगाकर सुन। ये प्राणी, जो अपने-अपने मोबाइल में, अपने-अपने फेसबुक में, वाट्सएप में, ट्विटर में, इंस्टाग्राम में हर समय खोए रहते हैं, वे दरअसल उन फॉर्मूलों को ढूंढ़ते रहते हैं, जिनसे तुरत चर्चा में आया जा सके।’ 
‘तो क्या मैं भी चर्चित हो सकता हूं?’
‘बिल्कुल। लेकिन इसके लिए कुछ न्यूनतम अर्हताएं चाहिए, जो तुम में नहीं दिखतीं।’ 
‘वे अर्हताएं क्या हैं प्रभु? खुलकर बताइए।’
‘क्या तुम किसी बड़े की मां-भैन की कर सकते हो और बाद में माफी मांग सकते हो?’ 
‘नहीं प्रभो, यह तो घोर अशिष्टता होगी।’
‘क्या तुम अपने फेसबुक पर किसी बड़े साहित्यकार की आए दिन ऐसी की तैसी करते रह सकते हो कि साला एकदम ‘फ्रॉड’ है, नकली है।’
‘क्या कह रहे हैं प्रभु? जिनके चरणों में बैठकर एमए-बीए किया, जिनकी नित्य गालियां सुनीं और लातें खाईं, जिन्हें खा-खाकर ही धन्य हुआ, और ऐसी सुदीर्घ साहित्य-साधना के एवज में उन्हीं की अमोघ कृपा से अन्यों को ठेलकर परमानेंट नौकरी पाई और अंतत: लेखक बना, उनके प्रति मैं ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता। मैं ‘गुरुद्रोह’ नहीं कर सकता।’ 
‘कोई बात नहीं, क्या तुम हर रोज जंतर-मंतर जा सकते हो और प्रमाण के रूप में सेल्फी से अन्यों को जला सकते हो? क्या तुम जंतर-मंतर पर जाकर जोर का नारा लगा सकते हो कि अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है?’ 
‘प्रभु, आप भी कैसी बातें करने लगे? मैं तो सोच रहा था, आप इस कलयुग के अनुकूल ऐसा ‘ज्ञान मार्ग’ सुझाएंगे कि मैं इस बरस बेस्टमबेस्ट बन जाऊं। जब इतिहास लिखा जाए, तो उसका एक चैप्टर मेरे पर भी हो। मुझे ‘कालजयी’ कहा जाय, ‘युग प्रवर्तक’ कहा जाए। कई एैरे-गैरे भी ‘युग प्रवर्तक’ हो चुके हैं। उन्हीं की तरह आप मेरे दिन भी फेर दें शरणागत वत्सल।’ 
‘अच्छा ये बताओ, अंग्रेजी में बोल सकते हो? एकदम फर्राटेदार, और उसमें भी कुछ नए अबूझ शब्द बोल सकते हो, जिसके मानी लोग डिक्शनरी में ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मर जाएं और थक-हारकर तुम्हारी मौलिकता का लोहा मान लें?’ 
‘मैं तो हिंदी वाला हूं। अंग्रेजी विरोधी आंदोलन में रहा हूं। इस जनम में तो अंग्रेजी उपासना न हो पाएगी’
‘तब क्या तुम उस अंग्रेजी लेखिका की तरह अपना नाम रंगा-बिल्ला बना सकते हो? या अस्सी के पार वाले बुजुर्ग इतिहासकार की तरह किसी राज्यपाल पर गुस्सा खा सकते हो? अपनी आस्तीनें चढ़ा सकते हो, ताकि अपनी क्रांतिकारी मुद्रा को ‘बड़ी खबर’ बना सको?’
‘सर जी, वे ‘विश्व-विजयी’ लोग हैं। कुछ भी कर सकते हैं। अगर मैंने किया, तो मेरी गति वही होगी, जो कहानी के उस गधे की हुई थी, जो रात्रि-बेला में धोबी के घर में, चोरों के आने पर जोर-जोर से रेंक पड़ा था और बाद में बुरी तरह से पिटा था।’ 
‘तब तो तेरा कुछ नहीं हो सकता।’

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