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मंगलाचरण और दंगलाचरण 

सुधीर पचौरी

यूं तो हिंदी में हजारों कवि हैं, लेकिन उनमें एक भी महाकवि नहीं। यह देख मेरा दिल जलता रहता है। इतनी बड़ी भाषा, और एक महाकवि नहीं। महाकवि को छोड़िए, आज अपने पास एक  राष्ट्रकवि तक नहीं है। इतना बड़ा राष्ट्र, इतने राष्ट्रप्रेमी, मगर एक भी राष्ट्रकवि नहीं। सच कहूं, मुझसे तो यह सहा नहीं जाता। महाकवि-राष्ट्रकवि की सीट को खाली देखा नहीं जाता। 
किंतु अपने राष्ट्रप्रेमी भी क्या करें? जब महाकवि ही नहीं, तो राष्ट्रकवि कहां से आए? हजारों छोटे-छोटे, नन्हे मुन्ने-मुन्नी कवि/ कवयित्री हैं। बहुत से युवा, बहुत सारे वयस्क कवि हैं। बहुत से रिटायर्ड, ‘नॉट टायर्ड’ कवि हैं। अस्सी के पार वाले भी कवि हैं, मगर उनके पास कवित्व कहां है? कविता के मामले में इतना बड़ा शून्य कभी नहीं रहा, जितना आज दिखता है। आप किसी महानुभाव के नाम के आगे ‘महा’ तो क्या, कायदे से ‘अहा’ तक नहीं लगा सकते। इतनी बड़ी भाषा, इतनी दीन कि एक महाकवि नमूने के लिए भी नहीं।
इस पर सोचा-जांचा, तो पता चला कि यह सब इसलिए है कि लोग काव्य की अपनी महान परंपरा को ही भूल गए हैं। सब महाकवियों ने काव्य का आरंभ करने से पहले एक मंगलाचरण अवश्य लिखा है और किसी-किसी ने तो इतना सुंदर लिखा है कि लगता है, उसी के कारण वे महाकवि हो पाए हैं। कवि ने मंगलाचरण लिखकर एक ओर तो शास्त्र का पालन किया और पंडितों की प्रशंसा का पात्र बना। दूसरे, मंगलाचरण लिखकर उसने अपने इष्टदेव की आराधना की है।
सारा जादू इसी मंगलाचरण का होता है। उसी से महाकाव्य संभव होता है। वह अपने इष्टदेव की ऐसी स्तुति करता है कि उसका आशीर्वाद मिले ही मिले और इसके बाद कविता अपने आप होने लगती है। लेकिन आज के कवि न मंगलाचरण लिखते हैं, न मंगलाचरण पढ़ते हैं। वे तो जब लिखते हैं, दंगलाचरण लिखते हैं। दंगलाचरण में महान कविता कैसे हो सकती है?
इसीलिए उर्वशी  के बाद पिछले 50-60 साल में एक भी महाकाव्य नहीं लिखा गया। आचार्यों ने कहा है कि इष्टदेव की कृपा नहीं होती, तो कविता नहीं होती। दो-चार, दस-पांच लाइनों के बाद कविता आगे नहीं बढ़ पाती और एक से एक अपठनीय कविता लिखी जाती। 
एक जमाना था जब मंगलाचरण कई काम करता था, क्योंकि वही काव्य का सिंहद्वार होता था। हर मंगलाचरण में विघ्नों को शांत करने की अपील की जाती थी। बेहद अलंकारिक भाषा में दो-तीन अर्थ बताने वाले शब्दों में इष्टदेव को प्रसन्न किया जाता था, ताकि देवता कवि की प्रतिभा को समझ लें और आशीर्वाद दे दें। यह मंगलाचरण ही प्रतिभा का नमूना होता था। वह प्रार्थना करता कि जिनने गोवर्धन पर्वत कन्नी उंगली पर धारणकर गिरधर का पद पाया, ऐसे मुरली बजैया रास रचैया हमारी रक्षा करें...।
अपने देवता से रक्षा की मंगलकामना करने से एक तो बहुत से विघ्न यूं ही दूर हो जाते हैं, दूसरे मंगलाचरण ही कवि के शिल्प को बताने वाला हो जाता है और इस तरह कवि चरित्र का विन्यास करता है, तो महाकाव्य अपने आप तैयार होता जाता है, और जब महाकाव्य हो जाता है, तो महाकवि तो होना ही हुआ। 
महाकाव्य का एक जरूरी काम है- ‘शाहेवक्त’ की प्रशंसा। यह संभला, तो समझो सब कुछ संभल गया। पुराने आचार्य इसी तरह संभालते थे। पर दंगलाचरण में मंगलाचरण वाली बात कैसे आए और विघ्न कैसे शांत हों? इसीलिए कहता हूं कि महाकवि बनना है, तो मंगलाचरण करिए, दंगलाचरण नहीं।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 5 january