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मंगलाचरण से दंगलाचरण

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

यह हिंदी साहित्य का स्वर्ण-युग है, जो मंगलाचरण से दंगलाचरण के युग में दाखिल हो गया है। अतीत के लेखक भी क्या लेखक थे? दिन-रात मंगलाचरण में लगे रहते। हर समय ऊंचे-ऊंचे सिद्धांत बघारते। एक से एक हेतु बताया करते। बड़े-बड़े प्रयोजनों से लिखा करते। फिर लिखते-लिखते मर जाते। एक लाइन की खबर तक नहीं बना पाते थे। जो भाग्यशाली होते, कुछ दिन लाइब्रेरियों में रहते। फिर कंडम होकर रद्दी के भाव बिक जाते। लेकिन आज के लेखकों की तरह वे भी कभी सेलिब्रिटी न बन पाते। कैसे बनते?
‘मंगलाचरण’ वाला युग भी क्या कोई रचनात्मक युग था। रिरियाता, पिनपिनाता हुआ। विनय की पाती लिखता हुआ। प्रार्थना की मुद्रा में मधुर मुरली सा धरा पर झुका हुआ। कोई लेखक अपने ‘मंगलाचरण’ से ऊबकर कभी विरोध भी करता, तो रेशम में लपेटकर करता। वह चापलूसी की चाशनी बनाता नजर आता। 
पुराने जितने महान हुए, आचार्य मम्मट के नसीहत के मारे रहे। उन्होंने यह लाइन कंपल्सरी कर दी थी कि अगर कभी किसी की आलोचना करनी ही पड़े, तो कांता सम्मित तयो उपदेश युजे के हिसाब से उसी तरह करना, जिस तरह कांता (पत्नी) पति को उपदेश देती है कि ‘ए जी, ओ जी, ये न करो जी, पैंयां पड़ूं जी’! 
हिंदी साहित्य के आठ सौ साल इसी तरह निकल गए। तब हर कोई या तो अपने भगवान को प्रसन्न करता रहता था या अपने मालिक राजा की तारीफ करता रहता था- मो सम कौन कुटिल खल कामी!  या कहता- मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय/ जा तन की झांई परै, स्याम हरित द्युति होय। या बादशाहों की तारीफमें कविताएं करता- गिलगिली हैं गिल में, गलीचा हैं, गुनीजन हैं...।
एक यह आज का जमाना कहता है कि जो किसी को नाराज नहीं कर सकता, वह भी क्या कोई लेखक है? पहले का लेखक मंगलाचरण में लगा रहता था, आज का लेखक दंगलाचरण का एक्सपर्ट है। इसीलिए कह रहा हूं कि साहित्य का असली ‘स्वर्ण-युग’ या कहूं कि उससे भी आगे का ‘प्लैटिनम-युग’ तो अब आया है।
दंगलाचरण का अपना साहित्यशास्त्र है। जब यह चार-पांच चरणों में सिलसिलेवार पूरा होता है, तब जाकर लेखक को 15 सेकंड की ‘देव-दुर्लभ’ क्वालिटी वाली अमरता प्राप्त होती है। लेकिन अब कोरे दंगलाचरण से भी काम नहीं चलता। किसी को नाराज करने या किसी का विरोध करने मात्र से काम नहीं चलता। दंगलाचरण को पूरी ‘कहानी’ चाहिए। 
पहले चरण में लेखक ‘तीखा लाल’ छाप, आलोचना कर, किसी को नाराज कर दंगल का शुभारंभ करता है। दूसरे चरण में उसके लिखने से किसी न किसी की भावनाओं का आहत होना आवश्यक है। तीसरे चरण में आहत भावना वाले समूह लेखक का विरोध करते हैं। चौथे चरण में लेखक कहता है कि जो विरोध कर रहे हैं, वे अभिव्यक्ति की आजादी के दुश्मन हैं। पांचवें चरण में मीडिया खबर बनाता है और देखते-देखते एक मामूली सा लेखक बड़े-बड़ों के कान काटने लगता है। 
सब कुछ के बाद सिर्फ लेखक रह जाता है और उसका दोस्त ‘खतरा’ बन जाता है। कोई नहीं पूछता कि लेखक ने क्या लिखा या किस क्वालिटी का लिखा है। सब खतरे का नख-शिख वर्णन करते रहते हैं। पहले विरोध, फिर उसका विरोध, फिर उस विरोध का विरोध। इसके बाद लेखक और ‘दंगलाचरण’ जंतर-मंतर पर बैठ जाता है और फिर पंद्रह सेकंड का शो देने लगता है।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 5 august