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आत्म-संघर्ष की महिमा

सुधीर पचौरी

इन दिनों कुछ भी लिखना मुश्किल लगता है। मेरी जगह कोई और लेखक होता, तो ऊंची हांकता कि मैं इन दिनों एक नई ‘जमीन फाड़ू’ कविता लिखने में बिजी हूं। डिस्टर्ब न करें। मैं कठिन ‘आत्म-संघर्ष’ से गुजर रहा हूं। वगैरह। इसे देख मेरा भी मन कर रहा है कि कुछ करूं न करूं, एक ठो ‘आत्म-संघर्ष’ जरूर कर डालूं। 
अपने हिंदी साहित्य ने पिछले पचास बरस में दो शब्द बड़ी मेहनत से कमाए हैं- एक है ‘संघर्ष’ और दूसरा ‘आत्म-संघर्ष’। यूं तो माक्र्स ने ‘संघर्ष’ शब्द मजदूर-किसानों के लिए रिजर्व किया था, लेकिन एक वक्त ऐसा आया, जब इसे हिंदी साहित्यकार अपने लिए ले उडे़। हालत यह हो गई कि लेखक चाहे अपने बाल-बच्चों समेत जंतर-मंतर देखने जाता, लेकिन कहता यही कि मैं तो वहां ‘संघर्ष’ करने गया था। इतिहास गवाह है कि हिंदी साहित्यकारों ने पिछले दशकों में इतना अधिक ‘संघर्ष’ किया है कि कविता-कहानी लिखना मात्र ‘आत्म-संघर्ष’ का पर्याय बन गया है।
इसीलिए कहता हूं कि अगर कोई कविता करता दिखे, तो समझिए कि बंदा ‘आत्म-संघर्ष’ में लीन है और अगर कहीं कोई ‘आत्म-संघर्ष’ करता दिखे, तो समझिए कविता या कहानी लिखने में बिजी है। अगर कोई लेखक ‘चुक’ गया है, यानी चाहकर भी कुछ नहीं लिख पा रहा है, लेकिन कहता यही रहता है कि इन दिनों वह एक बड़े काम में लगा है, तो समझिए कि वह किसी बड़े ‘आत्म-संघर्ष’ में लगा है, यानी किसी बड़े इनाम की ताक में है।
‘संघर्ष’ का सीधा मतलब है- किसी से पंगा लेना या लड़ना-झगड़ना। इस तर्क से ‘आत्म-संघर्ष’ का मतलब हुआ, अपनी आत्मा से झगड़ना, मन ही मन झगड़ना, मन ही मन किसी से पंगा लेना और मन ही मन अपने को छोड़ बाकी सबको शाप देना और कोसते रहना। साहित्यिक भाषा में कहें, तो किसी को गिराना, किसी को उठाना, किसी का नाम कटवाना, किसी का चढ़वाना, किसी को छोटा करना, किसी को अपमानित करना, किसी को हीन करना, किसी की किताब न छपने देना, किसी का रिव्यू न होने देना... ये सब साहित्य के ‘आत्म-संघर्ष’ की ही लीलाएं हैं। अगर ये न हों, तो कोई साहित्यकार क्यों बने?
साहित्य किसी अखाड़े से कम नहीं और हिंदी साहित्य तो सबसे बड़ा अखाड़ा है। यहां हर बंदा किसी न किसी से फाइट मारता रहता है। कोई नहीं मिलता, तो अपने आप से ही जूझने लगता है। इसे ही ‘आत्म-संघर्ष’ कहा करते हैं। चुनाव के इन दिनों तो सभी हिंदी वाले अपने-अपने ‘आत्म-संघर्ष’ में दिन-रात बिजी दिखते हैं। जैसे अगला पीएम कौन बनेगा? कौन विपक्ष का नेता होगा? एमपी कौन होगा? अपनी जाति वाला या किसी और जाति का? उस तक किसके जरिए पहुंचा जा सकता है? किस तरह से अपने एनजीओ के लिए पैसा लाया जा सकता है? कब किसके साथ कितनी देर तक सेक्युलर की तरह रहा जा सकता है और कितनी देर किसके साथ कम्यूनल की तरह रहा जा सकता है? किस तरह अपनी पोजीशन को हर हाल में जस्टीफाई किया जा सकता है?
यह आत्म-संघर्ष का ही प्रताप है कि जिसने जितना ‘आत्म-संघर्ष’ किया, वह उतना कीर्तिवान हुआ और उतना ही ऊपर गया। ‘क्रांति’ चाही, तो साहित्य की गद्दी पाई। प्रगतिवादी बने, तो ऐसे बने कि अपनी और अपने बाल-बच्चों की प्रगति की गारंटी कर ली।
आत्म-संघर्ष की महिमा देख मुझे भी अक्ल आ गई है और मैं भी ‘आत्म-संघर्ष’ में लीन होने वाला हूं। कृपया मई तक डिस्टर्ब न करें।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 31 march