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लिटफेस्ट हिटफेस्ट

सुधीर पचौरी

मुहल्ले के हलवाई की दुकान के पास से गुजरता हूं, तो लगता है कि लिटफेस्ट की खुशबू आ रही है। वही महक, वही रस, जो साहित्य में होता है। तंबू वाले की दुकान के पास से गुजरता हूं, तो कोई कहता है, हम लिटफेस्ट में तनने जा रहे हैं। आप आ रहे हैं न? आटा खरीदने दुकान पर गया, तो दुकानदार बोला, मैं त्रिलोकपुरी लिटफेस्ट में जा रहा हूं। आटे-दाल पर एक कविता सुनानी है। मेहमानों की दावत मेरी ओर से ही है। पान की दुकान पर गोपाल पान वाला बोला, सर एक कविता लिखी है, आज शाम को लिटफेस्ट में पढ़नी है। वह पान लगाना छोड़ कविता गाकर सुनाने लगा। 
इस साल अब तक चार-साढ़े चार सौ लिटफेस्ट हो चुके हैं और इतने ही मार्च तक और हो जाने हैं। अपनी हिंदी का मिजाज ही कुछ ऐसा है कि जो करती है, दिल खोलकर करती है। लिटफेस्ट की तकनीक भी तो सबके लिए आसान हो गई है। बस एक होटल वाले को समझाना है कि लिटफेस्ट कर ले, नाम कमा ले, ब्रांड बना ले। एक किताब वाले को पटाना है कि स्पांसर कर दे। एक दारुवाले को मनाना है कि मीडिया आ रहा है, फ्री में पिलाकर पुण्य लूट। 
हर शहर चाहता है कि उसका भी नाम हो। मीडिया में खबर बने। अपने नाम के लिए आजकल हर शहर कुछ भी करने को तैयार है। अगर आप इन सबका यूनाइटेड फ्रंट बना लेते हैं, तो समझ लीजिए कि आ गया आपका शहर लिटफेस्ट के नक्शे पर। साहित्य है ही ऐसी पुण्य चीज कि सभी दानी-महादानी कुछ करने को आतुर हो ही जाते हैं। इन सबको सांटने के बाद दस, बीस, पचास लाख कौन बड़ी बात है। एयर टिकट भी सस्ती है। होटल है ही टिकाने को। लेखक तो ऐसे ही तैयार बैठा रहता है आने के लिए। लिटफेस्ट का स्वाद ही कोरे ‘साहित्य’ से सवाया है। जिस शहर के नाम के आगे यह लग जाता है, वह इंटरनेशनल बुद्धिजीवी सर्किट में आ जाता है। 
जैसे ही कोई कहता है कि शहर का पांचवां लिटफेस्ट होने जा रहा है, तो सब लाइन लगा लेते हैं। औरों में गए हैं, तो इसमें भी जाना जरूरी है। शहर पुकार रहा है, तो उसे कैसे निराश किया जा सकता है? जब तक साहित्य गोष्ठियों के युग में रहा, साहित्य सिर्फ साहित्यकारों का रहा। वही सूर सूर तुलसी ससी उडुगन केशव दास जैसी बातें लोगों को बोर करती रहीं। लिटफेस्ट ने साहित्य का चाल, चेहरा, चरित्र- सब बदल दिया।
उसने साहित्य को कॉकटेल बना दिया है। एक साथ ‘नवरस’ संभव कर दिए हैं। एक ही मंच पर दस-दस मिनट कॉरपोरेट बोलता है, नेता बोलते हैं, प्रायोजक बोलते हैं, हीरो-हीरोइन बोलते हैं, गीतकार बोलते हैं, संगीतकार बोलते हैं, कवि-कथाकार भी बोलते हैं। सब खुश होकर एक ही घाट पर पानी पीते नजर आते हैं। लिटफेस्ट के अलावा ऐसी सुविधा और कहां? साहित्य का साहित्य, और धंधे का धंधा।
लिटफेस्ट को हिटफेस्ट करने के फॉरमूले भी हिट हो चले हैं। किसी महान को बुलाएं, तो उससे कह दें कि अपनी महानता की खातिर किसी को दो-चार भली-बुरी तो सुना दो। फिर हिट होने का आनंद लीजिए। कुछ हल्ला, कुछ हाय-हाय। यह क्या बक दिया इसने। माफी मांगे-माफी मांगे। जितनी माफी मंगवाई जाएगी, उतना ही लिटफेस्ट होगा हिटफेस्ट!
अपनी रचना से अमर हों न हों, लिटफेस्ट आपको 15 सेकंड के लिए अवश्य अमर कर देगा। और लेखक को क्या चाहिए?
करते रहिए लिटफेस्ट और होते रहिए हिटफेस्ट।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 30 december