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नए की जन्म कुंडली

सुधीर पचौरी

आप मुझे महान बनाएंगे। मैं आपको महान बनाऊंगा। जितनी देर आप महान बनाएंगे, उतनी देर मैं आपको महान बनाऊंगा। जिस तरह से आप महान बनाएंगे, वैसे ही आपको महान बनाऊंगा। जहां आप महान बनाएंगे, वहां मैं भी आपको महान बनाऊंगा।
मेरी किताब आए, तो आप लपक लेना। आपकी मैं लपक लूंगा। आप मेरी किताब को ‘अद्भुत’ कहेंगे, मैं आपकी किताब को ‘अद्भुत’ कहूंगा। यह ऐसा ‘अद्भुत’ समय है, जहां सब ‘अद्भुत-अद्भुत’ है। किसी के आए हों या न आए हों, हिंदी साहित्यकारों के अच्छे दिन आ गए हैं। अब कोई ‘मामूली’ नहीं। सभी ‘भव्य’, ‘दिव्य’ हैं। सभी ‘अद्भुत्तम’ हैं। यह साहित्य का ‘स्वर्ण युग’ है।
आज का लेखक कलम पकड़ते ही समझ जाता है कि ‘यथार्थ’ क्या है? उसे कैसे कहना है? आज हर लेखक दिन-रात ‘नया शिल्प’ रचता है, ‘नए मानक’ बनाता है, ‘नई जमीन’ तोड़ता है। आज फेसबुक पर जाते ही हर बंदा लेखक हो जाता है, ‘विचारक’ हो जाता है, ‘क्रांतिदर्शी’ हो जाता है। कभी कवि को उसके रसिक धीरे-धीरे मिला करते थे, अब तो खाता खोलते ही ‘मित्र’ मिल जाते हैं। यहां का ‘गोल्डन रूल’ है- तू मुझे पढ़, मैं तुझे पढ़ूं। तू मुझे ‘अमर’ बना, मैं तुझे ‘अमरता’ दिलाता हूं।
आज हर लेखक ‘पाठक’ है और हर पाठक ‘लेखक’। सीधा ‘लेन-देन’ है, यानी तू मेरी गा, मैं तेरी गाऊं। कितना भाग्यशाली है ‘नया लेखक’, जो 18-20 साल की उम्र में ही उस ‘महानता’ तक पहुंच जाता है, जहां जिंदगी भर कलम घिसते-घिसते बुढ़ापे में प्रेमचंद या निराला या अज्ञेय पहुंचे थे। 
साहित्य का इतिहास इन्हीं से शुरू होता है। पहले साहित्य था ही कहां? नए लेखक का नारा है- हम जहां खडे़ हो जाते हैं, इतिहास वहीं से शुरू होता है। हमें क्या पड़ी कि जानें कि हिंदी साहित्य में हमसे पहले कौन-कौन हुए? इतिहास का बोझ हम क्यों ढोएं? होंगे सूर-तुलसी-जायसी, हमारे मुकाबले वे क्या हैं? वे जिंदगी भर घिसते रहे, तो हमें क्या? हम क्यों घिसें?
कैसा बकवास जमाना था कि लेखक एक-दूसरे को बहुत सीरियसली लिया करते थे। दिनकर ने उर्वशी महाकाव्य लिखा, तो एक समीक्षक ने उसे ‘पके फल में कीड़े’ के समान बताया और दिनकर चुप रह गए। यह क्या बात हुई? आज कोई साला ‘कीड़ा-वीड़ा’ कहे तो देखना, हम उसका क्या बनाते हैं? साहित्य को इतना सीरियसली लेना बीमारी की निशानी है। 
हमारी नजर में तो ये दिन साहित्य के सबसे ‘अच्छे दिन’ हैं कि आप एक लाइन लिखिए और महान हो जाइए! बस, अपना ‘नेटवर्क’ रचिए। वर्तनी में गलती हो, चाहे वाक्यों में कर्ता और क्रिया में तालमेल न हो। यहां एक लाइन लिखने वाला भी महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल का बाप है। रचना प्रक्रिया, आलोचना प्रक्रिया और मूल्यांकन प्रक्रिया आदि सब बकवास है। सीधा नियम है- मैं लिखता हूं, इसलिए मैं हूं। जो मेरी उपेक्षा करे, मैं उसकी उपेक्षा करता हूं। जो मेरी परवाह करे, मैं उसकी परवाह करता हूं। इसे ही अंग्रेजी में ‘क्विड प्रो को’ कहा जाता है, यानी ‘जैसे को तैसा।’
वो कितना घटिया जमाना था कि लेखक वर्षों मेहनत करते, तब जाकर एक कविता-कहानी बनती। संपादक को भेजते, तो वे ‘खेद सहित वापस’ कर देते। फिर साधना करते, छपते और तब जाकर लेखक बनते। अब तो यह है कि लेखक भी आप, संपादक भी आप, प्रकाशक भी आप। दो चार शब्दों में ठांय-ठांय करो और 15 सेकंड के लिए ‘अमर’ हो जाओ।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 3 march