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वेताल का वैचारिक संघर्ष

सुधीर पचौरी

‘साहित्य का भविष्य’ पर एक ही वक्त में दो-दो साहित्य समारोह हो रहे हैं। यहां ‘इधर वाले’ समारोह का आंखों देखा हाल- शाम के पांच बज रहे हैं। लेखक लपकते हुए त्रिवेणी में पहुंच रहे हैं। हॉल के आगे ‘स्वागत’ लिखा है। पीछे चाय-नमकीन चल रहा है। सभी लपककर मिल रहे हैं, जैसे कुंभ में बिछड़े सगे भाई। कोई दो कदम आगे आकर हाथ मिलाता है, तो कोई तिरछा निकल जाता है, मानो बहुत जल्दी में हो। कोई दूर से मुस्कराता है, तो कोई नजर मिलते ही इधर-उधर देखने लगता है, जैसे बिल्ली रास्ता काट गई हो। एक ‘वार्तालाप’ का ‘ओपनिंग सीन’ इस तरह खुलता है-
-आप यहां कैसे?
-यही तो मैं पूछने वाला था। आपका नाम छपा है, आपको तो वहां होना था।
-बस जा ही रहा हूं। इनका आग्रह था कि बंधुवर आना है, वरना झगड़ा हो जाएगा। अच्छा हुआ कि आकर इनको भी सही ‘लाइन’ दे दी। 
-पर उधर आपका जाना अधिक जरूरी था। अगर कुछ उम्मीद है, तो उधर वालों से ही है।
-आप ठीक कह रहे हैं। लेकिन सबका ध्यान रखना पड़ता है। इस कठिन वक्त इनको भी सही ‘लाइन’ दे दी है।
-लेकिन ‘संघर्ष’ की असली लाइन तो ‘वहीं’ से मिलती है!
-इसमें क्या शक? शुरुआत तो ‘वहीं’ से होनी है। फिर भी यहां कुछ अच्छा हो जाए, तो क्या बुरा है? वहां कल सुबह पहुंच रहा हूं।
-क्यों? आज क्यों नहीं? मेरे पास ‘इन्नोवा’ है, संग चलें? प्रस्ताव तो मुझे ही रखना है।
‘प्रस्ताव’ का नाम आते ही ‘प्रिय साथी’ अंदर ही अंदर सुलग उठा। 
अब ‘उधर’ वाले समारोह का ‘आखों-देखा हाल’ सुनें- यहां हॉल के आगे अंग्रेजी में लिखा चमक रहा ह- ‘फ्यूचर ऑफ लिटरेचर’। सरल शब्दों में- ‘तेरा क्या होगा साहित्य?’ यहां भी सभी कामायनी  के चिंता सर्ग  के ‘मनु’ की तरह चिंतित दिखते हैं। यहां भी सब मानते हैं कि साहित्य को खतरा है। अब साहित्य को खतरा है, तो साहित्यकार को भी खतरा है। साहित्यकार को खतरा है, तो सबको खतरा है। सबको खतरा है, तो जनतंत्र को खतरा है। जनतंत्र को खतरा है, तो समाज को खतरा है। समाज को खतरा है, तो...।
एक पूछता है: ये ‘रचेगा-बचेगा-नचेगा’ क्या लगा रखा है? असली खतरा किससे है? ये तो बताओ। 
-खतरा तो दोनों से है!
-बकवास नहीं। बिल्कुल साफ-साफ बताओ कि ज्यादा खतरा किससे है?
-आप जानते ही हैं कि ‘किससे’ है?
-ये जिससे-किससे की पहेली न बुझाओ? संकट की इस घड़ी में बचना कायरता है।
-कौन कायर है साला? ध्यान रखो, हम नेता नहीं हैं, साहित्यकार हैं। सीधे नहीं कहा करते। कलात्मक तरीके से कहते हैं। 
-यह तुम्हारा संशोधनवाद है। गद्दारी है। खतरा तो दोनों से है।
-नहीं ‘एक’ से है। 
-नहीं ‘दोनों’ से है। हम जानते हैं कि तुम एक को क्यों बचा रहे हो? ताकि दूसरा भी बचा रहे और तुम भी। 
बहुत देर तक यह न तय हो सका कि असली शत्रु ‘एक’ है कि ‘दो’ और लड़ना है, तो पहले किससे या इकट्ठा लड़ना है? और साहित्यकार रचेगा कि लडे़गा? लडे़गा, तो बचेगा कैसे? 
ऐसे कठिन प्रश्नों से कन्फ्यूज होकर सभी साहित्यकार वेताल बन अपने फेसबुक पेज पर तू-तू मैं-मैं वाले वर्ग संघर्ष में बिजी हो गए। 

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 3 february