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सबसे घटिया लेखक

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

हिंदी में सभी लेखक उत्कृष्ट कोटि के, उच्च कोटि के, महान कोटि के कहलाते हैं। आज तक एक भी ऐसा आलोचक नहीं हुआ, जिसने किसी रचनाकार को घटिया या निकृष्ट कोटि का बताया हो। 
जहां सब कुछ अच्छा-अच्छा होता है, वहां कुछ तो ऐसा होता है, जो खराब हो। अगर सब कुछ बढ़िया-बढ़िया होगा, तो लोग घटिया को पहचानना ही भूल जाएंगे। इसी तर्क से मेरा यह मानना है कि जहां इतने सारे उत्कृष्ट और उच्च कोटि के लेखक होंगे, वहां कुछ निम्न व निकृष्ट कोटि के लेखक भी अवश्य होंगे। और क्या पता, जिनको उनके साहित्यिक पैरोकारों ने नाना उपायों के जरिए ‘उच्च कोटि’ का मनवा लिया है, उन्हीं में से कुछ एकदम घटिया कोटि के निकलें। बोरा भर आलू या टमाटर में सब एक जैसे बढ़िया तो नहीं होते, कुछ सडे़-गले होते ही हैं, इसी तरह कुछ लेखक भी क्या सड़े-गले आलू-टमाटर नहीं हो सकते?
मैं भी क्या करूं? मेरे शिक्षार्थी जीवन में गुरुजी ने एक ही मंत्र दिया था कि बेटे, हमेशा पॉजिटिव सोचना। दूसरों के बारे में अच्छा ही सोचना। तभी से मेरे समस्त ज्ञान-चक्षु बंद हो गए। मुझे हर लेखक में अच्छा ही अच्छा दिखाई देता रहा। मेरी ट्रेनिंग ही ऐसी रही कि जरा सा भाव मिलते ही मैं घटिया से घटिया रचना की जय-जय करने लगता। मैं तो गुणों का ग्राहक था, अवगुणों की ओर ताकता तक नहीं था। न कभी बुरा देखता, न सुनता, न कहता और न किसी का बुरा लिखता।
एक बार एक लेखक तीन किताबें जबर्दस्ती थमा गया कि देख लेना। मैंने उसे अपनी एक किताब न दी, वह तीन-तीन दे गया और धमकी सी भी दे गया कि तारीफ करनी है। उस दिन न जाने क्यों, मेरा जमीर जाग गया? सोचने लगा- कैसा बेशर्म लेखक है? एक घटिया लेखक ही इतनी घटिया बात कर सकता है। यह आलोचक को अपनी राय बनाने की तनिक आजादी तक नहीं दे रहा। यह तो चलो खुलकर बेशर्मी कर गया। ऐसे भी तो हैं, जो कुछ नहीं कहते। किताब भिजवा देते हैं। फिर ‘मित्र आईआईसी में मिलते हैं’ या ‘कभी घर आओ न’ जैसे कूट संकेतों से वही कहते हैं, जो बेशर्म मित्र ने कहा था।
कई बार मन किया कि दिल की बातें लिख डालूं कि यह दो कौड़ी का है, लेकिन सोचा कि क्यों दुश्मनी मोल लूं? यूं भी अब तक दुश्मन ही बनाए हैं। जिनको टॉप का कवि-कथाकार बताया, वह तक तो दुश्मन हो गए। अब जिसे घटिया कहूंगा, वह क्या मुझे छोड़ देगा? 
जिस तरह, हर कवि-कथाकार का एक ‘अंतर्मन’ होता है, उसी तरह हरेक आलोचक का भी होता है। जब साहित्य में इस तरह का ‘लिजलिजापन’ काबिज हो जाता है, तो फिर मन विद्रोह कर कहने लगता है कि कह दे बेटा मन की बात। गिरा दे इसका जहाज, ताकि साहित्य के मानक न गिरें, प्रतिभा की कद्र हो और मानकों की जगह नाते-रिश्तेदारी, मित्रता, रिश्वतखोरी काबिज न हो और हिंदी साहित्य स्टॉक-एक्सचेंज न बन जाए। एक बार जब एक बड़े लेखक की किताब को घटिया बताने बैठा, तो अचानक कबीर अपना दोहा सुनाने मेरे सामने बैठ गए- बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।/  जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।
मेरे साथ अक्सर ऐसा ही हुआ है कि जैसे ही किसी को घटिया बताने चला हूं, विघ्न पड़ा ही है। आज का जमाना तो और भी घटिया है। ‘घटिया’ कहते ही उसकी पब्लिसिटी हो जाती है। कैसा घटिया जमाना है कि चाहूं भी तो किसी को ‘घटिया’नहीं कह सकता।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 29 july