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5 जून, 2020|2:31|IST

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उत्तम कोटि के लेखक का अधम चित्रण

हिंदी में तीन तरह के साहित्यकार हैं- उत्तम, मध्यम, अधम। वे ‘उत्तम कोटि’ में आते हैं और मैं ‘अधम कोटि’ में। 
मैं इस सत्य को बहुत दिन बाद ही जान पाया कि साहित्यकार होने के लिए जरूरी नहीं कि वह हर समय लिखे और मरने तक ढेर सारा लिखता रहे। उत्तम कोटि के साहित्यकार ‘हंस’ की तरह होते हैं- कै हंसा मोती चुगे कै लंघन मर जाय। एक हम हैं, जो लिख-लिखके पाठकों को सताते हैं, और एक वे हैं, जो इतना कम लिखते हैं कि किसी को पढ़ने का कष्ट नहीं देते। उनकी साहित्य-साधना देख मुझे ईष्र्या होती है। मन धिक्कार उठता है कि तू कलम घसीटता रह गया और उसे देख, वह इतना आगे निकल गया।
मैं अपने मन को सांत्वना देता हूं, जैसे किसी हारे हुए को दी जाती है- अपनी-अपनी तकदीर है, वे तकदीर के धनी हैं, मैं नहीं हूं। मैं लिख-लिखकर अपनी उंगलियां घिस चला और उनका कमाल कि कलम गही नहिं हाथ और सारा साहित्य लिया साध। हम अपनी ‘साहित्य-साधना’ में लगे रहे कि यह पढ़ो-वह पढ़ो, इनको देखो-उनको देखो, उनको सुनो-इनको सुनो, इनका सेमिनार अटेंड करो-उनका करो। उनसे सीखो-इनसे सीखो। हम इसी में लगे रहे कि एक निजी लाइब्रेरी बनाओ, जिसमें दुनिया भर के लेखकों की सबसे अच्छी किताबें रखो, उनको पढ़ो और समझो, और फिर कुछ लिखो। हमने पढ़ रखा था कि करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। पुराने साहित्यकार बड़े अभ्यासी थे। हजारों पेज लिखते और फाड़ देते, तब जाकर गुरुजन ओके कहते। हम भी बरसों तक यही करते रहे। 
लेकिन एक वे रहे, जो साहित्य में जबसे पदार्पित किए, तब से सिर्फ मुस्कराते दिखे। एकदम ‘क्लीन शेव्ड’, मुंबईया भाषा में ‘चिकने’, सुचिक्कण। जब भी दिखते सुरुचि-संपन्न ही  थे। ‘क्रीज्ड’ कपड़ों से महंगे लेवेंडर की भीनी-भीनी खूशबू आती। उन्हें देखकर लगता कि साहित्य में चैन-अमन है। विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने वे गोष्ठी में हर एक को मुस्कराकर नमन करते। इतने ‘सोशल’ होते कि सबके जन्मदिन पर बधाई के साथ गुलदस्ते भेजते। नए बरस से लेकर होली, दिवाली, ईद, 15 अगस्त, 26 जनवरी, बड़े दिन, नए साल- सब पर ‘सर्वधर्म समभाव’ वाले भाव से सबको ‘हैप्पी डे’ वाला मैसेज भेजते। उनसे सब खुश रहते, हम से कोई खुश न होता। 
कन्याएं उन पर रीझ उठतीं- आप इतना सुंदर कैसे लिख लेते हैं? मन करता है आपकी उगलियां चूमूं। इस पर भी वे मंद-मंद मुस्कराते  हुए उनको गले से लगा लेते और हम जैसे डाह से जलने लगते। इस तरह वे हिट और हम पिट।
हम बात करते और अपने ज्ञान को दिखाते। वे इतने विनयी हो जाते कि कहते, अरे मुझे क्या आता है? आप कहते कि आप भाषण दीजिए, कुछ नया कहिए, तो वे एक ही भाषण देते, जो उन्होंने न जाने कब लिखा था। आप हर बार नया-नया कहने की कोशिश करते, लेकिन वे एक ही भाषण सर्वत्र उगल देते और हमसे अधिक तालियां लेते। हम कुछ सोचते-विचारते, बोलते तो अटकते। वाक्य लड़खड़ा जाते। जब वे बोलते, तो इतनी ‘नीट ऐंड क्लीन’ बोलते कि लगता, रिकॉर्ड बज रहा है और इस पर भी उनको ताली मिलती। किसी शोक सभा में होते, तो भी उनकी मुस्कान न जाती और हम सब जब शोक जताने का नाटक करते, वे दार्शनिक भाव से भरे नजर आते, मानो कह रहे हों- हे प्राणी, जो शोक के योग्य नहीं, तू उसका शोक करता है। 
ऐसे उत्तम कोटि के लेखक हर काल में होते हैं और आजकल भी हैं।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 29 december