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मेरी लाइन, मंथरा आंटी की लाइन

सुधीर पचौरी

कुछ ने कहा- इनको हराओ। कुछ ने कहा- इनको जिताओ। मैंने ली तीसरी लाइन। वही ‘मंथरा आंटी’ वाली लाइन कि कोउ नृप होउ हमहि का हानी/ चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।
लेखक इधर दस्तखत करते रहे, उधर दस्तखत करते रहे। अखबारों में छपाते रहे और अपना नाम आया कि न आया, इसे देखते रहे। सोचते रहे कि हम लेखक हैं, इसलिए जनता से कहेंगे तो वह तुरत मान ही लेगी। कुछ सोशल मीडिया पर कहते रहे कि हमने नहीं किए, हमने नहीं किए। पर इस दौर में क्या भरोसा? झूठ में सच, सच में झूठ, कभी-कभी तो दोनों का ऐसा मिश्रण होता है कि पता ही नहीं चलता कि असल बात क्या थी। इसीलिए मैंने मंथरा देवी की लाइन ली, जो अब ‘लोकोक्ति’ की तरह काम करती है।
कितनी अद्भुत राजनीतिक साहित्यिक लाइन है यह। ऐसा लगता है कि आज की स्थिति को देखकर कही गई हो। मैं तो कहता हूं कि जब कभी कोई साहित्यकार संकट में हो और ‘दस्तखत गैंग’ वाले पूछते रहते हों कि तय करो किस ओर हो तुम? अथवा पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?, तो सीधे मंथरा आंटी की काव्य पंक्तियों को बोल दो। ‘चेरि’ की जगह ‘लेखक’ कर दीजिए और कह दीजिए कि कोई जीते, कोई हारे मुझे क्या? मुझे तो कलम घसीटनी है।
जब से मंथरा आंटी की राजनीतिक लाइन को मैंने सीरियसली लिया है, मन कर रहा है कि उस पर एक पूरी थीसिस ही लिख डालूं। क्या गजब की ‘पॉलिटिकल थियरी’है? क्या तो विचार की ऊंचाई है? इससे सिद्ध होता है कि राजतंत्र में भी ‘न्यूट्रल गियर’ संभव था। बताइए, क्या मंथरा को समझाने  कोई ‘दस्तखत ब्रिगेड’ गई थी? मेरा तो दावा है कि अपनी मंथरा आंटी पश्चिम के चिंतकों से बहुत आगे थीं। उनके आगे यूरोप के देकार्त और कांट-फांट सब पानी मांगते हैं। मंथरा ने कोई बड़ी पोथी नहीं लिखी। दो चार चौपाइयों में अपने मन की बात कह दी। और भइए, वे दो चार लाइनें ही आज तक जनता की जुबान पर चढ़ी रहती हैं कि ‘कोउ नृप होइ हमें का हानी़...’। साफ है कि ज्ञान का आखिरी खूंटा पश्चिम के चिंतकों जैसे देकार्त या कांट आदि ने नहीं गाड़ा, बल्कि अपने हिंदी साहित्य में उसे बहुत पहले गाड़ दिया गया था। बस चाहिए, तो देखने वाली नजर। 
इसीलिए जब-जब क्रांतिकारी ‘दस्तखत गैंग’ मुझे तंग करता है और पूछने लगता है कि  कि तय करो किस ओर हो?  या पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? , तो पहले तो मेरा मन यही कहने को करता है कि अबे तुम हो कौन मुझसे पूछने वाले? क्या तुम मेरे नेता हो? मेरे नायक हो? कौन हो? मैं तुमको क्यों बता दूं कि मैं क्या चाहता हूं? लेकिन मैं यह सब नहीं पूछता, क्योंकि अपनी लेखक बिरादरी की असलियत जानता हूं। लेखक हैं भी तो कैसे-कैसे?
न मुहल्ले वाले जानें, न बाजार वाले पहचानें। ज्यादातर ‘मेड इन हार्वर्ड-ऑक्सफर्ड’ ‘मेड इन मीडिया’ और ‘मेड इन लुटियंस’। अगर मित्र संपादक न हो, तो कोई छापने वाला नहीं। अव्वल तो किताब छपती नहीं। छपती है, तो तीन सौ कॉपी और वह भी पूरी बिकती नहीं। दो-चार साल में अगर बिक भी जाए, तो कोई पढ़ता नहीं। और हैं बड़े लेखक। क्या अदा है?
ऐसे लेखकों का जनता से क्या मतलब? अरे भइए, पहले कायदे के लेखक बनो। फिर अपने पाठक जनता बनाओ और तब शायद वह आपको जान सके। साहित्य में जनता का जाप करते हो और उसी जनता को अनाड़ी मानते हो कि आप न समझाएंगे, तो वह समझेगी नहीं।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 28 april