DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बिहारी वाला लिटफेस्ट

सुधीर पचौरी

सोचिए कि पहले ‘जयपुर लिटफेस्ट’ का आइडिया किसने दिया होगा? कहने को तो कोई कह देगा कि इसमें आइडिया की क्या बात है? अंग्रेजी का ‘लिटरेचर’ और ‘फेस्टीवल’ को आधा-आधा काटकर जोड़ दिया और ‘लिटफेस्ट’ हो गया। पर मैं कहूंगा कि लिटफेस्ट का पहला आइडिया कविवर बिहारी ने दिया। जयपुर में रहकर ही बिहारी ने सतसई की रचना की। उसमें कई ऐसे दोहे मिलेंगे, जो प्रकारांतर से ‘लिटफेस्ट’ के आइडियाज से भरे हैं। उनको पढ़ते हुए आपको लगेगा कि आज का जेपी लिटफेस्ट बिहारी की कविता का ही विस्तार है।
जिस तरह शोले  में गब्बर पूछा करता है कि कितने आदमी थे? लिटफेस्ट वाले पूछा करते हैं कि कितने ‘चरण’(फुटफॉल) पडे़? और बताते रहते हैं कि देखो, आज मेले में 50 हजार ‘चरण’ पड़े। इस सबका मूल कारण बिहारी की सतसई ही है। मुझे तो सतसई का हर एक दोहा जयपुर लिटफेस्ट सिग्नेचर ट्यून लगता है। कहने वाले कहेंगे कि ये पचौरी का बच्चा इस लिटफेस्ट का भी ‘भारतीयकरण’ किए दे रहा है। लेकिन सच यही है कि अगर सतसई में बिहारी ने ‘लिटफेस्ट’ के बीज न बोए होते, तो लिटफेस्ट जयपुर से शुरू न होता।  
बिहारी ने इस पर कई दोहे कहे हैं। हम जानते ही हैं ये सब ‘पेड’ दोहे हुआ करते थे। जिस तरह आज के लेखक ‘पेड’ होते हैं, उसी तरह के बिहारी भी ‘पेड राइटर’ थे। फर्क इतना है कि बिहारी को हर दोहे पर एक अशर्फी मिला करती थी, आज के कवियों को धेला भी नहीं मिलता। कम से कम हिंदी कवियों का तो यही हाल है। 
लिटफेस्ट की तरह उस समय में भी स्पॉन्सर थे। बिहारी के स्पॉन्सर उस वक्त के राजा थे, तो आज के लिटफेस्ट के स्पॉन्सर भी राजा लोग हैं। होता भी ‘दिग्गी पैलेस’ में है।
यहां हम लिटफेस्ट का आइडिया देने वाले सिर्फ एक दोहे की चर्चा करेंगे। दोहे में युवक-युवती साहित्यिक संवाद करते हैं। अगर कोई इन संवादों को ठीक से पढ़े, और डीकांस्ट्रक्ट करे, तो उसे वही मजा आएगा, जो आज के लिटफेस्ट में युवा लेखक-लेखिकाओं को देखकर मिलता है। बिहारी कहते हैं- कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात/ भरे भौन में करत हैं नैनन ही सों बात।
अब तक आचार्य इस एक्शन युक्त दोहे की एकतरफा व्यख्या ही करते आए हैं कि युवक-युवती आखों ही आखों में प्रेम संवाद कर रहे हैं, वगैरह। इस परंपरागत अर्थ से अलग अब करें नया पोस्टमॉडर्न वाला अर्थ। तब हमें दोहे को कुछ इस तरह पढ़ना होगा- ‘कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात/ भरे हॉल में करते हैं वाट्सएप सों बात!’
तब नैनों से बातें होती थीं, अब वाट्सएप से होती है। तब ‘प्रेमालाप’ होता था, अब ‘फ्रेमालाप’ होता है। नए-नए ‘वुड बी’ टाइप के युवा लेखक-लेखिकाएं लिटफेस्ट में आते हैं और आपस मेें वाट्सएपिया संवाद रचते हैैं और भरे सम्मेलन में आपस में वाट्सएप से ‘साहित्यिक संवाद’ करते रहते हैं।
‘नेटफ्लिक्स’ तो अब आया है, बिहारीजी तो कई सौ बरस पहले ही युवक-युुवतियों को ‘नैनफ्ल्क्सि’ छाप दोहे सुना-दिखा गए।
आप दिग्गी पैलेस जाएं और वहां के सीन देखें, तो आपको युवक-युवतियां, सब साहित्य में आते-जाते, टहलते-बहलते-उछलते, सेल्फी लेते-देते, लाइव स्ट्रीमिंग करते हुए दिखेंगे। इसीलिए मेरा कहना है कि आगे से जयपुर लिटफेस्ट न कहकर  इसे ‘बिहारी वाला लिटफेस्ट’ कहें। जिसने आइडिया दिया, उसकी कुछ तो कद्र करें।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 27 january